महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextब्रह्मवेदी कुरुक्षेत्रं पुण्यं ब्रह्मर्षिसेवितम् ।। २०६ ।।
तस्मिन् वसन्ति ये मर्त्या न ते शोच्याः कथंचन ।। २०७ ।।
कुरुक्षेत्र ब्रह्माजीकी वेदी है, इस पुण्यक्षेत्रका ब्रह्मर्षिगण सेवन करते हैं। जो मानव उसमें निवास करते हैं, वे किसी प्रकार शोकजनक अवस्थामें नहीं पड़ते ।। २०६-२०७ ।।
तरन्तुकारन्तुकयोर्यदन्तरं
रामह्रदानां च मचक्रुकस्य च ।
एतत् कुरुक्षेत्रसमन्तपञ्चकं
पितामहस्योत्तरवेदिरुच्यते ।। २०८ ।।
तरन्तुक और अरन्तुकके तथा रामह्रद और मचक्रुकके बीचका जो भूभाग है, यही कुरुक्षेत्र एवं समन्तपञ्चक है। इसे ब्रह्माजीकी उत्तरवेदी कहते हैं ।। २०८ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि पुलस्त्यतीर्थयात्रायां त्र्यशीतितमोऽध्यायः ।। ८३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें पुलस्त्यतीर्थयात्राविषयक तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८३ ।।