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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,580 pages

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उन पापरहित महात्माओंने (त्रिवेणीतटपर) ब्राह्मणोंको धन दान किया। भरतनन्दन! तत्पश्चात् पाण्डव ब्राह्मणोंके साथ ब्रह्माजीकी वेदीपर गये, जो तपस्वीजनोंसे सेवित है। वहाँ उन वीरोंने उत्तम तपस्या करते हुए निवास किया। वे सदा कन्द-मूल-फल आदि वन्य हविष्यद्वारा ब्राह्मणोंको तृप्त करते रहते थे ।। ६-७१/२ ।।

ततो महीधरं जग्मुर्धर्मज्ञेनाभिसंस्कृतम् ।। ८ ।। राजर्षिणा पुण्यकृता गयेनानुपमद्युते । अनुपम तेजस्वी जनमेजय! प्रयागसे चलकर पाण्डव पुण्यात्मा एवं धर्मज्ञ राजर्षि गयके द्वारा यज्ञ करके शुद्ध किये हुए उत्तम पर्वतसे उपलक्षित गयातीर्थमें गये ।। ८१/२ ।।

नगो गयशिरो यत्र पुण्या चैव महानदी ।। ९ ।। वानीरमालिनी रम्या नदी पुलिनशोभिता । जहाँ गयशिर नामक पर्वत और बेंतकी पंक्तियोंसे घिरी हुई रमणीय महानदी है, जो अपने दोनों तटोंसे विशेष शोभा पाती है ।। ९१/२ ।।

दिव्यं पवित्रकूटं च पवित्रं धरणीधरम् ।। १० ।। ऋषिजुष्टं सुपुण्यं तत् तीर्थं ब्रह्मसरोत्तमम् । अगस्त्यो भगवान् यत्र गतो वैवस्वतं प्रति ।। ११ ।। वहाँ महर्षियोंसे सेवित, पावन शिखरोंवाला, दिव्य एवं पवित्र दूसरा पर्वत भी है जो अत्यन्त पुण्यदायक तीर्थ है। वहीं उत्तम ब्रह्मसरोवर है जहाँ भगवान् अगस्त्यमुनि वैवस्वत यमसे मिलनेके लिये पधारे थे ।। १०-११ ।।

उवास च स्वयं तत्र धर्मराजः सनातनः । सर्वासां सरितां चैव समुद्भेदो विशाम्पते ।। १२ ।। क्योंकि सनातन धर्मराज वहाँ स्वयं निवास करते हैं। राजन्! वहाँ सम्पूर्ण नदियोंका प्राकट्य हुआ है ।।

यत्र संनिहितो नित्यं महादेवः पिनाकधृक् । तत्र ते पाण्डवा वीराश्चातुर्मास्यैस्तदेजिरे ।। १३ ।। ऋषियज्ञेन महता यत्राक्षयवटो महान् । पिनाकपाणि भगवान् महादेव उस तीर्थमें नित्य निवास करते हैं। वहाँ वीर पाण्डवोंने उन दिनों चातुर्मास्यव्रत ग्रहण करके महान् ऋषियज्ञ अर्थात् वेदादि सत्शास्त्रोंके स्वाध्यायद्वारा भगवान्‌की आराधना की। वहीं महान् अक्षयवट है ।। १३१/२ ।।

अक्षये देवयजने अक्षयं यत्र वै फलम् ।। १४ ।। देवताओंकी वह यज्ञभूमि अक्षय है और वहाँ किये हुए प्रत्येक सत्कर्मका फल अक्षय होता है ।। १४ ।।

ते तु तत्रोपवासांस्तु चक्रुर्नि Schweit... ते तु तत्रोपवासांस्तु चक्रुर्नेश्चितमानसाः । ब्राह्मणास्तत्र शतशः समाजग्मुस्तपोधनाः ।। १५ ।।