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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,580 pages

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राजेन्द्र! उस समय पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने महर्षि लोमशसे पूछा—‘भगवन्! परशुरामजीके तेजका अपहरण किसलिये किया गया था और प्रभो! वह इन्हें पुनः किस प्रकार प्राप्त हो गया? यह मैं जानना चाहता हूँ। आप कृपा करके इस प्रसंगका वर्णन करें' ।। ३९ ।।

लोमश उवाच

शृणु रामस्य राजेन्द्र भार्गवस्य च धीमतः ।
जातो दशरथस्यासीत् पुत्रो रामो महात्मनः ।। ४० ।।
विष्णुः स्वेन शरीरेण रावणस्य वधाय वै ।
पश्यामस्तमयोध्यायां जातं दाशरथिं ततः ।। ४१ ।।
**लोमशजीने कहा—**राजेन्द्र! तुम दशरथनन्दन श्रीराम तथा परम बुद्धिमान् भृगुनन्दन परशुरामजीका चरित्र सुनो। पूर्वकालमें महात्मा राजा दशरथके यहाँ साक्षात् भगवान् विष्णु अपने ही सच्चिदानन्दमय विग्रहसे श्रीरामरूपमें अवतीर्ण हुए थे। उनके अवतारका उद्देश्य था—पापी रावणका विनाश। अयोध्यामें प्रकट हुए दशरथनन्दन श्रीरामका हम लोग प्रायः दर्शन करते रहते थे ।। ४०-४१ ।।
ऋचीकनन्दनों रामो भार्गवो रेणुकासुतः ।
तस्य दाशरथेः श्रुत्वा रामस्याक्लिष्टकर्मणः ।। ४२ ।।
कौतूहलान्वितो रामस्त्वयोध्यागमत् पुनः ।
धनुरादाय तद् दिव्यं क्षत्रियाणां निबर्हणम् ।। ४३ ।।
अनायास ही महान् कर्म करनेवाले दशरथकुमार श्रीरामका भारी पराक्रम सुनकर भृगु तथा ऋचीकके वंशज रेणुकानन्दन परशुराम उन्हें देखनेके लिये उत्सुक हो क्षत्रियसंहारक दिव्य धनुष लिये अयोध्यामें आये ।। ४२-४३ ।।
जिज्ञासमानो रामस्य वीर्यं दाशरथेस्तदा ।
तं वै दशरथः श्रुत्वा विषयान्तमुपागतम् ।। ४४ ।।
प्रेषयामास रामस्य रामं पुत्रं पुरस्कृतम् ।
स तमभ्यागतं दृष्ट्वा उद्यतास्त्रमवस्थितम् ।। ४५ ।।
प्रहसन्निव कौन्तेय रामो वचनमब्रवीत् ।
कृतकालं हि राजेन्द्र धनुरेतन्मया विभो ।। ४६ ।।
समारोपय यत्नेन यदि शक्नोषि पार्थिव ।

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