महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextदधीच इति विख्यातो महानृषिरुदारधीः ।। ७ ।। तं गत्वा सहिताः सर्वे वरं वै सम्प्रयाचत । स वो दास्यति धर्मात्मा सुप्रीतेनान्तरात्मना ।। ८ ।। ‘मैं तुम्हें एक उपाय बता रहा हूँ, जिससे तुम वृत्रासुरका वध कर सकोगे। दधीच नामसे विख्यात जो उदारचेता महर्षि हैं, उनके पास जाकर तुम सब लोग एक साथ एक ही वर माँगो। वे बड़े धर्मात्मा हैं। अत्यन्त प्रसन्नमनसे तुम्हें मुँहमाँगी वस्तु देंगे ।। ७-८ ।। स वाच्यः सहितैः सर्वैर्भवद्भिर्जयकाङ्क्षिभिः । स्वान्यस्थीनि प्रयच्छेति त्रैलोक्यस्य हिताय वै ।। ९ ।। ‘जब वे वर देना स्वीकार कर लें तब विजयकी अभिलाषा रखनेवाले तुम सब लोग उनसे एक साथ यों कहना—‘महात्मन्! आप तीनों लोकोंके हितके लिये अपने शरीरकी हड्डियाँ प्रदान करें’ ।। ९ ।। स शरीरं समुत्सृज्य स्वान्यस्थीनि प्रदास्यति । तस्यास्थिभिर्महाघोरं वज्रं संस्क्रियतां दृढम् ।। १० ।। ‘तुम्हारे माँगनेपर वे शरीर त्यागकर अपनी हड्डियाँ दे देंगे। उनकी उन हड्डियोंद्वारा तुमलोग सुदृढ़ एवं अत्यन्त भयंकर वज्रका निर्माण करो ।। १० ।। महच्छत्रुहणं घोरं षडश्रं भीमनिःस्वनम् । तेन वज्रेण वै वृत्रं वधिष्यति शतक्रतुः ।। ११ ।।