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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,580 pages

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वरदायक भगवान् शिवको देखते ही महाबाहु राजा सगरने दोनों पत्नियोंसहित प्रणाम किया और पुत्रके लिये याचना की। तब भगवान् शिवने प्रसन्न होकर पत्नीसहित नृपश्रेष्ठ सगरसे कहा—‘राजन्! तुमने यहाँ जिस मुहूर्तमें वर माँगा है, उसका परिणाम यह होगा ।। १३-१४ ।।

षष्टिः पुत्रसहस्राणि शूराः परमदर्पिताः । एकस्यां सम्भविष्यन्ति पत्न्यां नरवरोत्तम ।। १५ ।। ते चैव सर्वे सहिताः क्षयं यास्यन्ति पार्थिव । एको वंशधरः शूर एकस्यां सम्भविष्यति ।। १६ ।। ‘नरश्रेष्ठ! तुम्हारी एक पत्नीके गर्भसे अत्यन्त अभिमानी साठ हजार शूरवीर पुत्र होंगे, परंतु वे सब-के-सब एक ही साथ नष्ट हो जायँगे। भूपाल! तुम्हारी जो दूसरी पत्नी है, उसके गर्भसे एक ही शूरवीर वंशधर पुत्र उत्पन्न होगा’ ।। १५-१६ ।। एवमुक्त्वा तु तं रुद्रस्तत्रैवान्तरधीयत । स चापि सगरो राजा जगाम स्वं निवेशनम् ।। १७ ।। पत्नीभ्यां सहितस्तत्र सोऽतिहृष्टमनास्तदा ।