महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextउन्होंने उसी मार्गसे समुद्रमें प्रवेश किया और महात्मा कपिल तथा यज्ञिय अश्वको देखा ।। ५० ।।
स दृष्ट्वा तेजसो राशिं पुराणमृषिसत्तमम् । प्रणम्य शिरसा भूमौ कार्यमस्मै न्यवेदयत् ।। ५१ ।।
तेजोराशि मुनिप्रवर पुराणपुरुष कपिलजीका दर्शन करके अंशुमान्ने धरतीपर माथा टेककर प्रणाम किया और उनसे अपना कार्य बताया ।। ५१ ।।
ततः प्रीतो महाराज कपिलोंऽशुमतोऽभवत् । उवाच चैनं धर्मात्मा वरदोऽस्मीति भारत ।। ५२ ।।
भरतवंशी महाराज! इससे धर्मात्मा कपिलजी अंशुमान्पर प्रसन्न हो गये और बोले—'मैं तुम्हें वर देनेको उद्यत हूँ' ।। ५२ ।।
स वव्रे तुरगं तत्र प्रथमं यज्ञकारणात् । द्वितीयं वरकं वव्रे पितॄणां पावनेच्छया ।। ५३ ।।
अंशुमान्ने पहले तो यज्ञकार्यकी सिद्धिके लिये वहाँ उस अश्वके लिये प्रार्थना की और दूसरा वर अपने पितरोंको पवित्र करनेकी इच्छासे माँगा ।। ५३ ।।
तमुवाच महातेजाः कपिलो मुनिपुङ्गवः । ददानि तव भद्रं ते यद् यत् प्रार्थयसेऽनघ ।। ५४ ।। त्वयि क्षमा च धर्मश्च सत्यं चापि प्रतिष्ठितम् ।