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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,580 pages

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भगवान् भृगुने अत्यन्त प्रसन्न होकर अपनी पुत्रवधूसे कहा—'सौभाग्यवती बहू! कोई वर माँगो, मैं तुम्हारी इच्छाके अनुरूप वर प्रदान करूँगा' ।। ३३ ।। सा वै प्रसादयामास तं गुरुं पुत्रकारणात् । आत्मनश्चैव मातुश्च प्रसादं च चकार सः ।। ३४ ।। सत्यवतीने श्वशुरको अपने और अपनी माताके लिये पुत्र-प्राप्तिका उद्देश्य रखकर प्रसन्न किया। तब भृगुजीने उसपर कृपादृष्टि की ।। ३४ ।।

भृगुरुवाच ऋतौ त्वं चैव माता च स्नाते पुंसवनाय वै । आलिङ्गेतां पृथग् वृक्षौ साश्वत्थं त्वमुदुम्बरम् ।। ३५ ।। **भृगुजी बोले—**बहू! ऋतुकालमें स्नान करनेके पश्चात् तुम और तुम्हारी माता पुत्र-प्राप्तिके उद्देश्यसे दो भिन्न-भिन्न वृक्षोंका आलिंगन करो। तुम्हारी माता तो पीपलका और तुम गूलरका आलिंगन करना ।। ३५ ।। चरुद्वयमिदं भद्रे जनन्याश्च तवैव च । विश्वमावर्तयित्वा तु मया यत्नेन साधितम् ।। ३६ ।। भद्रे! मैंने विराट् पुरुष परमात्माका चिन्तन करके तुम्हारे और तुम्हारी माताके लिये यत्नपूर्वक दो चरु तैयार किये हैं ।। ३६ ।। प्राशितव्यं प्रयत्नेन चेत्युक्त्वादर्शनं गतः ।