महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
DevanagariSanskritpublished2,343 pages
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एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
पाण्डवपक्षके रथी, महारथी एवं अतिरथी आदिका वर्णन
भीष्म उवाच
पञ्चालराजस्य सुतो राजन् परपुरंजयः ।
शिखण्डी रथमुख्यो मे मतः पार्थस्य भारत ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! भरतनन्दन! पांचालराज द्रुपदका पुत्र शिखण्डी शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाला है, मैं उसे युधिष्ठिरकी सेनाका एक प्रमुख रथी मानता हूँ ॥ १ ॥
एष योत्स्यति संग्रामे नाशयन् पूर्वसंस्थितम् ।
परं यशो विप्रथयंस्तव सेनासु भारत ॥ २ ॥
भारत! वह तुम्हारी सेनामें प्रवेश करके अपने पूर्व अपयशका नाश तथा उत्तम सुयशका विस्तार करता हुआ बड़े उत्साहसे युद्ध करेगा ॥ २ ॥
एतस्य बहुलाः सेनाः पञ्चालाश्च प्रभद्रकाः ।
तेनासौ रथवंशेन महत् कर्म करिष्यति ॥ ३ ॥