BharatKosha
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,343 pages

Page 1328 of 2343

Read in context
Page 1328

उनके अधीन एक लाख रथ, आठ हजार हाथी और साठ हजार घुड़सवार थे ॥ ३० ॥ तत्सिन्धुपतिना राज्ञा पालितं ध्वजिनीमुखम् । अनन्तरथनागाश्वमशोभत महद् बलम् ॥ ३१ ॥ सिन्धुराजके द्वारा सुरक्षित अनन्त रथ, हाथी और घोड़ोंसे भरी हुई वह विशाल सेना अद्भुत शोभा पा रही थी ॥ ३१ ॥ षष्ट्या रथसहस्रैस्तु नागानामयुतेन च । पतिः सर्वकलिङ्गानां ययौ केतुमता सह ॥ ३२ ॥ कलिङ्गदेशका राजा श्रुतायुध अपने मित्र केतुमान्‌के साथ साठ हजार रथ और दस हजार हाथियोंको साथ लिये युद्धके लिये चला ॥ ३२ ॥ तस्य पर्वतसंकाशा व्यरोचन्त महागजाः । यन्त्रतोमरतूणीरैः पताकाभिः सुशोभिताः ॥ ३३ ॥ यन्त्र, तोमर, तूणीर तथा पताकाओंसे सुशोभित उसके विशाल गजराज पर्वतोंके समान प्रतीत होते थे ॥ ३३ ॥ शुशुभे केतुमुख्येन पावकेन कलिङ्गकः । श्वेतच्छत्रेण निष्केण चामरव्यजनेन च ॥ ३४ ॥ कलिङ्गराजके रथकी ध्वजापर अग्निका चिह्न बना हुआ था। वह श्वेत छत्र और चँवररूपी पंखेसे तथा पदक (कण्ठहार)-से विभूषित हो बड़ी शोभा पा रहा था ॥ ३४ ॥ केतुमानपि मातङ्गं विचित्रपरमाङ्कुशम् । आस्थितः समरे राजन् मेघस्थ इव भानुमान् ॥ ३५ ॥ राजन्! केतुमान् भी विचित्र एवं विशाल अंकुशसे युक्त गजराजपर आरूढ़ हो समरभूमिमें खड़ा हुआ मेघोंकी घटाके ऊपर प्रकाशित होनेवाले सूर्यदेवके समान जान पड़ता था ॥ ३५ ॥ तेजसा दीप्यमानस्तु वारणोत्तममास्थितः । भगदत्तो ययौ राजा यथा वज्रधरस्तथा ॥ ३६ ॥ गजस्कन्धगतावास्तां भगदत्तेन सम्मितौ । विन्दानुविन्दावावन्त्यौ केतुमन्तमनुव्रतौ ॥ ३७ ॥ इसी प्रकार श्रेष्ठ गजराजपर आरूढ़ हो राजा भगदत्त भी वज्रधारी इन्द्रके समान अपने तेजसे उद्दीप्त हो युद्धके लिये आगे बढ़ गये थे। अवन्तिदेशके राजकुमार विन्द और अनुविन्द भी भगदत्तके समान ही तेजस्वी थे। वे दोनों भाई हाथीकी पीठपर बैठकर केतुमान्‌के पीछे-पीछे चल रहे थे ॥ ३६-३७ ॥ स रथानीकवान् व्यूहो हस्त्यङ्गो नृपशीर्षवान् । वाजिपक्षः पतत्युग्रः प्रहसन् सर्वतोमुखः ॥ ३८ ॥