महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in context‘जब भीमसेन लोहेसे बनी हुई अपनी सुदृढ़ गदा हाथोंमें ले महान् वेगसे विचरते हैं, उस समय वे समुद्रको भी सोख सकते हैं। केकयराजकुमार, धृष्टकेतु और चेकितान भी ऐसे ही पराक्रमी हैं॥ १३ १/२ ॥
एते तिष्ठन्ति सामात्याः प्रेक्षकास्ते जनाधिप ॥ १४ ॥ धृतराष्ट्रस्य दायादा इति बीभत्सुरब्रवीत् । भीमसेनं तदा राजन् दर्शयस्व महाबलम् ॥ १५ ॥ ‘नरेश्वर! ये धृतराष्ट्रके पुत्र अपने मन्त्रियोंसहित आपकी ओर देख रहे हैं।' राजन्! युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर अर्जुन भीमसेनसे बोले—‘अब आप इन शत्रुओंको अपना महान् बल दिखाइये’ ॥ १४-१५ ॥
ब्रुवाणं तु तथा पार्थं सर्वसैन्यानि भारत । अपूजयंस्तदा वाग्भिरनुकूलाभिराहवे ॥ १६ ॥ भारत! अर्जुनके ऐसा कहनेपर उस युद्धस्थलमें समस्त सैनिकोंने अनुकूल वचनोंद्वारा उस समय उनका पूजन समादर किया ॥ १६ ॥
एवमुक्त्वा महाबाहुस्तथा चक्रे धनंजयः । व्यूह्य तानि बलान्याशु प्रययौ फाल्गुनस्तथा ॥ १७ ॥ महाबाहु अर्जुनने ऐसा कहकर उसी तरह किया; अपनी सब सेनाओंका शीघ्र ही व्यूह बनाया और रणके लिये प्रस्थान किया ॥ १७ ॥
सम्प्रायातान् कुरून् दृष्ट्वा पाण्डवानां महाचमूः । गङ्गेव पूर्णा स्तिमिता स्पन्दमाना व्यदृश्यत ॥ १८ ॥ कौरवोंको अपनी ओर आते देख पाण्डवोंकी वह विशाल सेना पहले तो भरी हुई गंगाके समान स्थिर दिखायी दी; फिर उसमें धीरे-धीरे कुछ चेष्टा दृष्टिगोचर होने लगी ॥ १८ ॥
भीमसेनोऽग्रणीस्तेषां धृष्टद्युम्नश्च वीर्यवान् । नकुलः सहदेवश्च धृष्टकेतुश्च पार्थिवः ॥ १९ ॥ पाण्डवसेनामें भीमसेन सबसे आगे चलनेवाले थे। उनके साथ पराक्रमी धृष्टद्युम्न, नकुल, सहदेव तथा चेदिराज धृष्टकेतु भी थे ॥ १९ ॥
विराटश्च ततः पश्चाद् राजाथाक्षौहिणीवृतः । भ्रातृभिः सह पुत्रैश्च सोऽभ्यरक्षत् पृष्ठतः ॥ २० ॥ तत्पश्चात् राजा विराट अपने भाइयों और पुत्रोंके साथ एक अक्षौहिणी सेना लेकर भीमसेनके पृष्ठभागकी रक्षा कर रहे थे ॥ २० ॥
चक्ररक्षौ तु भीमस्य माद्रीपुत्रौ महाद्युतौ । द्रौपदेयाः ससौभद्राः पृष्ठगोपास्तरस्विनः ॥ २१ ॥