महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextराजन्! आपके तथा शत्रुओंके रथोंपर जो बहुसंख्यक विशाल ध्वज फहरा रहे थे, उन सबको तिरस्कृत करके केवल अर्जुनके रथपर एकमात्र महान् कपिसे उपलक्षित दिव्य ध्वज शोभा पाता था॥ २९॥ पादातास्त्वग्रतोऽगच्छन्नसिशक्त्यृष्टिपाणयः। अनेकशतसाहस्रा भीमसेनस्य रक्षिणः॥ ३०॥ भीमसेनकी रक्षाके लिये उनके आगे-आगे हाथोंमें खड्ग, शक्ति तथा ऋष्टि लिये कई लाख पैदल सैनिक चल रहे थे॥ ३०॥ वारणा दशसाहस्राः प्रभिन्नकरटामुखाः। शूरा हेममयैर्जालैर्दीप्यमाना इवाचलाः॥ ३१॥ क्षरन्त इव जीमूता महार्हाः पद्मगन्धिनः। राजानमन्वयुः पश्चाज्जीमूता इव वार्षिकाः॥ ३२॥ राजा युधिष्ठिरके पीछे वर्षाकालके मेघोंकी भाँति तथा पर्वतोंके समान ऊँचे-ऊँचे दस हजार गजराज जा रहे थे। उनके गण्डस्थलसे फूटकर मदकी धारा बह रही थी। वे सोनेकी जालीदार झूलोंसे उद्दीप्त हो रहे थे। उनमें शौर्य भरा था। वे मेघोंके समान मदकी बूँदें बरसाते थे। उनसे कमलके समान सुगन्ध निकलती थी और वे सभी बहुमूल्य थे॥ ३१-३२॥ भीमसेनो गदां भीमां प्रकर्षन् परिघोपमाम्। प्रचकर्ष महासैन्यं दुराधर्षो महामनाः॥ ३३॥ दुर्जय वीर महामनस्वी भीमसेन हाथमें परिघके समान मोटी एवं भयंकर गदा लिये अपने साथ विशाल सेनाको खींचे लिये जा रहे थे॥ ३३॥ तमर्कमिव दुष्प्रेक्ष्यं तपन्तमिव वाहिनीम्। न शेकुः सर्वयोधास्ते प्रतिवीक्षितुमन्तिके॥ ३४॥ उस समय सूर्यकी भाँति उनकी ओर देखना कठिन हो रहा था। वे आपकी सेनाको संतप्त-सी कर रहे थे। निकट आनेपर समस्त योद्धा उनकी ओर आँख उठाकर देखनेमें भी समर्थ न हो सके॥ ३४॥ वज्रो नामैष स व्यूहो निर्भयः सर्वतोमुखः। चापविद्युद्ध्यजो घोरो गुप्तो गाण्डीवधन्वना॥ ३५॥ यह वज्र नामक व्यूह सर्वथा भयरहित तथा सब ओर मुखवाला था। उसके ध्वजके निकट सुवर्णभूषित धनुष विद्युत्के समान प्रकाशित होता था। गाण्डीवधारी अर्जुनके द्वारा ही वह भयंकर व्यूह सुरक्षित था॥ ३५॥ यं प्रतिव्यूह्य तिष्ठन्ति पाण्डवास्तव वाहिनीम्। अजेयो मानुषे लोके पाण्डवैरभिरक्षितः॥ ३६॥