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महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,343 pages

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वह क्षेत्र जो और जैसा है तथा जिन विकारोंवाला है और जिस कारणसे जो हुआ है तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जो और जिस प्रभाववाला है—वह सब संक्षेपमें मुझसे सुन ॥ ३ ॥

सम्बन्ध—तीसरे श्लोकमें 'क्षेत्र' और 'क्षेत्रज्ञ' के जिस तत्त्वको संक्षेपमें सुननेके लिये भगवान्‌ने अर्जुनसे कहा है—अब उसके विषयमें ऋषि, वेद और ब्रह्म-सूत्रकी उक्तिका प्रमाण देकर भगवान् ऋषि, वेद और ब्रह्मसूत्रको आदर देते हैं—

ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः१ पृथक् । ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव२ हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥ ४ ॥

यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका तत्त्व ऋषियोंद्वारा३ बहुत प्रकारसे कहा गया है और विविध वेदमन्त्रोंद्वारा भी विभागपूर्वक कहा गया है तथा भलीभाँति निश्चय किये हुए युक्तियुक्त ब्रह्मसूत्रके पदोंद्वारा भी कहा गया है ॥

महाभूतान्यहंकारो४ बुद्धिरव्यक्तमेव च । इन्द्रियाणि दशकं चैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥ ५ ॥५

पाँच महाभूत, अहंकार६, बुद्धि७ और मूल प्रकृति३ भी; तथा दस इन्द्रियाँ३, एक मन३ और पाँच इन्द्रियोंके विषय४ अर्थात् शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध— ॥ ५ ॥

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः । एतत् क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥ ६ ॥

तथा इच्छा,५ द्वेष,६ सुख,७ दुःख,८ स्थूल देहका पिण्ड, चेतना९ और धृति१०—इस प्रकार विकारोंके सहित यह क्षेत्र संक्षेपमें कहा गया११। ॥ ६ ॥

सम्बन्ध—इस प्रकार क्षेत्रके स्वरूप और उसके विकारोंका वर्णन करनेके बाद अब जो दूसरे श्लोकमें यह बात कही थी कि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका जो ज्ञान है, वही मेरे मतसे ज्ञान है—उस ज्ञानको प्राप्त करनेके साधनोंका 'ज्ञान' के ही नामसे पाँच श्लोकोंद्वारा वर्णन करते हैं—

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा१२ १३ क्षान्तिरार्जवम् । आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥ ७ ॥

श्रेष्ठताके अभिमानका अभाव, दम्भाचरणका अभाव, किसी भी प्राणीको किसी प्रकार भी न सताना१, क्षमाभाव२, मन-वाणी आदिकी सरलता३, श्रद्धा-भक्तिसहित गुरुकी सेवा४, बाहर-भीतरकी शुद्धि५, अन्तःकरणकी स्थिरता६ और मन-इन्द्रियों-सहित शरीरका निग्रह७ ॥ ७ ॥

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार८ ९ एव च । जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥ ८ ॥