महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextसम्बन्ध—इस प्रकार तीन तरहके यज्ञोंके लक्षण बतलाकर, अब तपके लक्षणोंका प्रकरण आरम्भ करते हुए चार श्लोकोंद्वारा सात्त्विक तपके लक्षण बतलाते हैं—
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं^७ शौचमार्जवम् ।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥ १४ ॥
देवता, ब्राह्मण, गुरु और ज्ञानीजनोंका पूजन, पवित्रता,^८ सरलता,^३ ब्रह्मचर्य^३ और अहिंसा^३—यह शरीरसम्बन्धी तप कहा जाता है^४ ॥ १४ ॥
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।^५
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥ १५ ॥
जो उद्वेग न करनेवाला, प्रिय और हितकारक एवं यथार्थ भाषण है तथा जो वेद-शास्त्रोंके पठनका एवं परमेश्वरके नाम-जपका अभ्यास है, वही वाणीसम्बन्धी तप कहा जाता है ॥
मनःप्रसादः^६ सौम्यत्वं^७ मौनमात्मविनिग्रहः^८ ^९ ।
भावसंशुद्धिरित्येतत्^१० तपो मानसमुच्यते ॥ १६ ॥
मनकी प्रसन्नता, शान्तभाव, भगवच्चिन्तन करनेका स्वभाव, मनका निग्रह और अन्तःकरणके भावोंकी भलीभाँति पवित्रता—इस प्रकार यह मनसम्बन्धी तप कहा जाता है ॥ १६ ॥
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत् त्रिविधं नरैः ।
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः^११ सात्त्विकं परिचक्षते ॥ १७ ॥
फलको न चाहनेवाले योगी पुरुषोंद्वारा परमश्रद्धासे किये हुए^१२ उस पूर्वोक्त तीन प्रकारके तपको सात्त्विक कहते हैं^१३ ॥ १७ ॥
सम्बन्ध—अब राजस तपके लक्षण बतलाये जाते हैं—
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन^१ चैव यत् ।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्^२ ॥ १८ ॥
जो तप सत्कार, मान और पूजाके लिये तथा अन्य किसी स्वार्थके लिये भी^३ स्वभावसे या पाखण्डसे किया जाता है, वह अनिश्चित एवं क्षणिक फलवाला तप यहाँ राजस कहा गया है ॥ १८ ॥
सम्बन्ध—अब तामस तपके लक्षण बतलाते हैं, जो कि सर्वथा त्याज्य हैं—
मूढग्राहेणात्मनो^४ यत् पीडया क्रियते तपः ।
परस्योत्सादनार्थं वा तत् तामसमुदाहृतम् ॥ १९ ॥