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महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,343 pages

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[ "विषयेन्द्रियसंयोगाद् यत्तदग्रेऽमृतोपमम् ।", "परिणामे विषमिव तत् सुखं राजसं स्मृतम् ॥ ३८ ॥", "जो सुख विषय और इन्द्रियोंके संयोगसे होता है, वह पहले—भोगकालमें अमृतके", "तुल्य प्रतीत होनेपर भी परिणाममें विषके तुल्य है; इसलिये वह सुख राजस कहा गया", "है२ ॥ ३८ ॥", "यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः ।", "निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ ३९ ॥", "जो सुख भोगकालमें तथा परिणाममें भी आत्माको मोहित करनेवाला है, वह निद्रा,", "आलस्य और प्रमादसे उत्पन्न सुख३ तामस कहा गया है ॥ ३९ ॥", "न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।", "सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात् त्रिभिर्गुणैः ॥ ४० ॥", "पृथ्वीमें या आकाशमें अथवा देवताओंमें तथा इनके सिवा और कहीं भी ऐसा कोई भी", "सत्त्व नहीं है, जो प्रकृतिसे उत्पन्न इन तीनों गुणोंसे रहित हो४ ॥ ४० ॥", "सम्बन्ध—इस अध्यायके चौथेसे बारहवें श्लोकतक भगवान्ने अपने मतके अनुसार", "त्याग और त्यागीके लक्षण बतलाये। तदनन्तर तेरहवेंसे सत्रहवें श्लोकतक संन्यास", "(सांख्य)-के स्वरूपका निरूपण करके संन्यासमें सहायक सत्त्वगुणका ग्रहण और उसके", "विरोधी रज एवं तमका त्याग करानेके उद्देश्यसे अठारहवेंसे चालीसवें श्लोकतक गुणोंके", "अनुसार ज्ञान, कर्म और कर्ता आदि मुख्य-मुख्य पदार्थोंके भेद समझाये और अन्तमें समस्त", "सृष्टिको गुणोंसे युक्त बतलाकर उस विषयका उपसंहार किया।", "वहाँ त्यागका स्वरूप बतलाते समय भगवान्ने यह बात कही थी कि नियत कर्मका", "स्वरूपसे त्याग उचित नहीं है (गीता १८।७), अपितु नियत कर्मोंको आसक्ति और फलके", "त्यागपूर्वक करते रहना ही वास्तविक त्याग है (गीता १८।९), किंतु वहाँ यह बात नहीं", "बतलायी कि किसके लिये कौन-सा कर्म नियत है। अतएव अब संक्षेपमें नियत कर्मोंका", "स्वरूप, त्यागके नामसे वर्णित कर्मयोगमें भक्तिका सहयोग और उसका फल परम", "सिद्धिकी प्राप्ति बतलानेके लिये पुनः उसी त्यागरूप कर्मयोगका प्रकरण आरम्भ करते हैं", "—", "ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप ।", "कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥ ४१ ॥", "हे परंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंके तथा शूद्रोंके३ कर्म स्वभावसे उत्पन्न गुणोंद्वारा", "विभक्त किये गये हैं३ ॥ ४१ ॥", "शमो१ दमस्तपः२ ३ शौचं४ क्षान्तिरार्जवमेव५ ६ च ।" ]