महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextमहाबाहु भीमसेन रथोंसे रथियोंको, हाथियोंसे हाथी-सवारोंको, घोड़ोंकी पीठोंसे घुड़सवारोंको और पृथ्वीपर पैदलोंको मसलते हुए गदासे आपके पुत्रकी सेनाके सब लोगोंको उसी प्रकार नष्ट कर देते थे, जैसे हवा अपने वेगसे वृक्षोंको उखाड़ फेंकती है ।। सापि मज्जावसामांसैः प्रदिग्धा रुधिरेण च ।। १६ ।। अदृश्यत महारौद्रा गदा नागाश्वपातनी । हाथियों और घोड़ोंको मार गिरानेवाली उनकी वह गदा भी मज्जा, वसा, मांस तथा रक्तमें सनकर बड़ी भयानक दिखायी देती थी ।। १६ १/२ ।। तत्र तत्र हतैश्चापि मनुष्यगजवाजिभिः ।। १७ ।। रणाङ्गणं समभवन्मृरावाससंनिभम् । जहाँ-तहाँ मरकर गिरे हुए मनुष्य, हाथी और घोड़ोंसे वह सारी रणभूमि मृत्युके निवासस्थान-सी प्रतीत होती थी ।। १७ १/२ ।। पिनाकमिव रुद्रस्य क्रुद्धस्याभिघ्नतः पशून् ।। १८ ।। यमदण्डोपमामुग्रामिन्द्राशनिसमस्वनाम् । ददृशुर्भीमसेनस्य रौद्रीं विशसनीं गदाम् ।। १९ ।। भीमसेनकी उस संहारकारिणी भयंकर गदाको लोगोंने प्रलयकालमें पशुओं (जीवों)-का संहार करनेवाले रुद्रके पिनाक और यमदण्डके समान भयंकर देखा। उसकी आवाज इन्द्रके वज्रके समान थी ।। १८-१९ ।। आविद्धयतो गदां तस्य कौन्तेयस्य महात्मनः । बभौ रूपं महाघोरं कालस्येव युगक्षये ।। २० ।। अपनी गदाको घुमाते हुए महामना कुन्तीकुमार भीमसेनका रूप युगान्त-कालके यमराजके समान अत्यन्त भयंकर प्रतीत होता था ।। २० ।। तं तथा महतीं सेनां द्रावयन्तं पुनः पुनः । दृष्ट्वा मृत्युमिवायान्तं सर्वे विमनसोऽभवन् ।। २१ ।। उस विशाल सेनाको बारंबार भगानेवाले भीमसेनको मौतके समान सामने आते देख समस्त योद्धाओंका मन उदास हो जाता था ।। २१ ।। यतो यतः प्रेक्षते स्म गदामुद्यम्य पाण्डवः । तेन तेन स्म दीर्यन्ते सर्वसैन्यानि भारत ।। २२ ।। भारत! भीमसेन गदा उठाकर जिस-जिस ओर देखते थे, उधर-उधरसे सारी सेनाओंमें दरार पड़ जाती थी (वहाँके सैनिक भागकर स्थान खाली कर देते थे) ।। २२ ।। प्रदारयन्तं सैन्यानि बलेनामितविक्रमम् । ग्रसमानमनीकानि व्यादितास्यमिवान्तकम् ।। २३ ।। तं तथा भीमकर्माणं प्रगृहीतमहागदम् । दृष्ट्वा वृकोदरं भीष्मः सहसैव समभ्ययात् ।। २४ ।।