महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in context'ये महाधनुर्धर राजा भगदत्त युद्धमें दुरात्मा घटोत्कचके साथ जूझ रहे हैं और संकटमें पड़ गये हैं ।। ६४ ।।
राक्षसश्च महाकायः स च राजातिकोपनः । एतौ समेतौ समरे कालमृत्युसमावुभौ ।। ६५ ।। 'वह राक्षस विशालकाय है और वे राजा भी अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए हैं। वे दोनों समरमें काल और मृत्युके समान हैं ।। ६५ ।।
श्रूयते चैव हृष्टानां पाण्डवानां महास्वनः । हस्तिनश्चैव सुमहान् भीतस्य रुदितध्वनिः ।। ६६ ।। 'देखो, हर्षमें भरे हुए पाण्डवोंका महान् सिंहनाद सुनायी पड़ता है और भगदत्तके डरे हुए हाथीके रोनेकी ध्वनि भी बड़े जोर-जोरसे कानोंमें आ रही है ।। ६६ ।।
तत्र गच्छाम भद्रं वो राजानं परिरक्षितुम् । अरक्ष्यमाणः समरे क्षिप्रं प्राणान् विमोक्ष्यति ।। ६७ ।। 'तुम सब लोगोंका कल्याण हो। हम राजा भगदत्तकी रक्षा करनेके लिये वहाँ चलें; अन्यथा अरक्षित होनेपर वे समरभूमिमें शीघ्र ही प्राण त्याग देंगे ।। ६७ ।।
ते त्वरध्वं महावीर्याः किं चिरेण प्रयामहे । महान् हि वर्तते रौद्रः संग्रामो लोमहर्षणः ।। ६८ ।। 'महापराक्रमी वीरो! जल्दी करो। विलम्बसे क्या लाभ? हमें जल्दी चलना चाहिये; क्योंकि वह संग्राम अत्यन्त भयंकर तथा रोमांचकारी है ।। ६८ ।।
भक्तश्च कुलपुत्रश्च शूरश्च पृतनापतिः । युक्तं तस्य परित्राणं कर्तुमस्माभिरच्युत ।। ६९ ।। 'राजा भगदत्त कुलीन, शूरवीर, हमारे भक्त और सेनापति हैं। अतः अच्युत! हमें उनकी रक्षा अवश्य करनी चाहिये' ।। ६९ ।।
भीष्मस्य तद् वचः श्रुत्वा सर्व एव महारथाः । द्रोणभीष्मौ पुरस्कृत्य भगदत्तपरीप्सया ।। ७० ।। उत्तमं जवमास्थाय प्रययुर्यत्र सोऽभवत् । भीष्मका यह वचन सुनकर सभी महारथी द्रोणाचार्य और भीष्मको आगे करके भगदत्तकी रक्षाके लिये बड़े वेगसे उस स्थानपर गये, जहाँ भगदत्त थे ।। ७० १/२ ।।
तान् प्रयातान् समालोक्य युधिष्ठिरपुरोगमाः ।। ७१ ।। पञ्चालाः पाण्डवैः सार्धं पृष्ठतोऽनुययुः परान् । उन्हें जाते देख युधिष्ठिर आदि पाण्डवों तथा पांचालोंने भी शत्रुओंका पीछा किया ।। ७१ १/२ ।।
तान्यनीकान्यथालोक्य राक्षसेन्द्रः प्रतापवान् ।। ७२ ।। ननाद सुमहानादं विस्फोटमशनेरिव ।