महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextनन्दयामास सुहृदो मयं जित्वेव वासवः ॥ २० ॥ मयासुरपर विजय पानेवाले इन्द्रकी भाँति अभिमन्युने उस विशाल सेनाको भगाकर, महारथियोंको कँपाकर अपने सुहृदोंको आनन्दित किया ॥ २० ॥
तेन विद्राव्यमाणानि तव सैन्यानि संयुगे । चक्रुरार्तस्वनं घोरं पर्जन्यनिनदोपमम् ॥ २१ ॥ उसके द्वारा युद्धमें खदेड़े हुए आपके सैनिक मेघोंकी गर्जनाके समान घोर आर्तनाद करने लगे ॥ २१ ॥
तं श्रुत्वा निनदं घोरं तव सैन्यस्य भारत । मारुतोद्भूतवेगस्य सागरस्येव पर्वणि ॥ २२ ॥ दुर्योधनस्तदा राजन्नार्ष्यशृङ्किमभाषत । एष कार्ष्णिर्महाबाहो द्वितीय इव फाल्गुनः ॥ २३ ॥ भरतवंशी नरेश! पूर्णिमाके दिन वायुके थपेड़ोंसे उद्वेलित हुए समुद्रकी गर्जनाके समान आपकी सेनाका वह भयंकर चीत्कार सुनकर उस समय दुर्योधनने राक्षस ऋष्यशृंगपुत्र अलम्बुषसे इस प्रकार कहा—‘महाबाहो! यह अर्जुनका पुत्र द्वितीय अर्जुनके समान पराक्रमी है ॥ २२-२३ ॥
चमूं द्रावयते क्रोधाद् वृत्रो देवचमूमिव । तस्य चान्यन्न पश्यामि संयुगे भेषजं महत् ॥ २४ ॥ ऋते त्वां राक्षसश्रेष्ठं सर्वविद्यासु पारगम् । ‘जैसे वृत्रासुर देवताओंकी सेनाको मार भगाता था, उसी प्रकार वह भी क्रोधपूर्वक मेरी सेनाको खदेड़ रहा है। मैं युद्धस्थलमें सम्पूर्ण विद्याओंके पारंगत तथा राक्षसोंमें सर्वश्रेष्ठ तुम-जैसे वीरको छोड़कर दूसरे किसीको ऐसा नहीं देखता, जो उस रोगकी सबसे उत्तम दवा हो सके ॥ २४ १/२ ॥
स गत्वा त्वरितं वीरं जहि सौभद्रमाहवे ॥ २५ ॥ वयं पार्थं हनिष्यामो भीष्मद्रोणपुरोगमाः । ‘अतः तुम तुरंत जाकर युद्धके मैदानमें वीर सुभद्रकुमारका वध करो और हमलोग भीष्म तथा द्रोणाचार्यको आगे करके अर्जुनको मार डालेंगे’ ॥ २५ १/२ ॥
स एवमुक्तो बलवान् राक्षसेन्द्रः प्रतापवान् ॥ २६ ॥ प्रययौ समरे तूर्णं तव पुत्रस्य शासनात् । नर्दमानो महानादं प्रावृषीव बलाहकः ॥ २७ ॥ आपके पुत्र दुर्योधनके ऐसा कहनेपर उसकी आज्ञासे बलवान् एवं प्रतापी राक्षसराज अलम्बुष तुरंत ही वर्षाकालके मेघकी भाँति जोर-जोरसे गर्जना करता हुआ समरभूमिमें गया ॥ २६-२७ ॥
तस्य शब्देन महता पाण्डवानां बलं महत् ।