महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextफिर समरांगणमें शत्रुसे पीड़ित एवं विमुख हुए राक्षसने शत्रुओंको तपानेवाली अपनी (अन्धकारमयी) तामसी महामाया प्रकट की ।। २२ १/२ ।। ततस्ते तमसा सर्वे वृताश्चासन् महीपते ।। २३ ।। नाभिमन्युमपश्यन्त नैव स्वान् न परान् रणे । महीपते! तब वे समस्त पाण्डव सैनिक अन्धकारसे आच्छादित हो गये। अतः न तो रणक्षेत्रमें अभिमन्युको देख पाते थे और न अपने तथा शत्रुपक्षके सैनिकोंको ही ।। अभिमन्युश्च तद् दृष्ट्वा घोररूपं महत्तमः ।। २४ ।। प्रादुश्चक्रेऽस्त्रमत्युग्रं भास्करं कुरुनन्दनः । ततः प्रकाशमभवज्जगत् सर्वं महीपते ।। २५ ।। यह भयंकर एवं महान् अन्धकार देखकर कुरु-कुलको आनन्दित करनेवाले अभिमन्युने अत्यन्त उग्र भास्करास्त्रको प्रकट किया। राजन्! इससे सम्पूर्ण जगत्में प्रकाश छा गया ।। २४-२५ ।। तां चाभिजघ्निवान् मायां राक्षसस्य दुरात्मनः । संक्रुद्धश्च महावीर्यो राक्षसेन्द्रं नरोत्तमः ।। २६ ।। छादयामास समरे शरैः संनतपर्वभिः । इस प्रकार महापराक्रमी नरश्रेष्ठ अभिमन्युने उस दुरात्मा राक्षसकी मायाको नष्ट कर दिया और अत्यन्त कुपित हो झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा उसे समरभूमिमें आच्छादित कर दिया ।। २६ १/२ ।। बह्वीस्तथान्या मायाश्च प्रयुक्तास्तेन रक्षसा ।। २७ ।। सर्वास्त्रविद्मेयात्मा वारयामास फाल्गुनिः । उस राक्षसने और भी बहुत-सी जिन-जिन मायाओंका प्रयोग किया, उन सबको सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता अनन्त आत्मबलसे सम्पन्न अभिमन्युने नष्ट कर दिया ।। २७ १/२ ।। हतमायं ततो रक्षो वध्यमानं च सायकैः ।। २८ ।। रथं तत्रैव संत्यज्य प्राद्रवन्महतो भयात् । अपनी माया नष्ट हो जानेपर सायकोंकी मार खाता हुआ राक्षस अलम्बुष अत्यन्त भयके कारण अपने रथको वहीं छोड़कर भाग गया ।। २८ १/२ ।। तस्मिन् विनिर्जिते तूर्णं कूटयोधिनि राक्षसे ।। २९ ।। आर्जुनः समरे सैन्यं तावकं सम्ममर्द ह । मदान्धो गन्धनागेन्द्रः सपद्मां पद्मिनीमिव ।। ३० ।। मायाद्वारा युद्ध करनेवाले उस राक्षसके पराजित हो जानेपर अर्जुनकुमार अभिमन्युने तुरंत ही रणक्षेत्रमें आपकी सेनाका उसी प्रकार मर्दन आरम्भ किया, जैसे गन्धयुक्त मदान्ध गजराज कमलोंसे भरी हुई पुष्करिणीको मथ डालता है ।। २९-३० ।। ततः शान्तनवो भीष्मः सैन्यं दृष्ट्वाभिविद्रुतम् ।