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महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,343 pages

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त्वयोच्यमानः श्रेयोऽपि संरम्भान्न ग्रहीष्यति ॥ ६ ॥ ‘ये तथा और भी बहुत-से दोष उसमें भरे हुए हैं। आप उसे हितकी बात बतायेंगे, तो भी वह क्रोधवश उसे स्वीकार नहीं करेगा ॥ ६ ॥

भीष्मे द्रोणे कृपे कर्णे द्रोणपुत्रे जयद्रथे । भूयसीं वर्तते वृत्तिं न शमे कुरुते मनः ॥ ७ ॥ ‘वह भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा तथा जयद्रथपर अधिक भरोसा रखता है, अतः उसके मनमें संधि करनेका विचार ही नहीं होता है ॥ ७ ॥

निश्चितं धार्तराष्ट्राणां सकर्णानां जनार्दन । भीष्मद्रोणमुखान् पार्था न शक्ताः प्रतिवीक्षितुम् ॥ ८ ॥ ‘जनार्दन! धृतराष्ट्रके सभी पुत्रों तथा कर्णकी यह निश्चित धारणा है कि कुन्तीके पुत्र भीष्म एवं द्रोणाचार्य आदि वीरोंकी ओर देखनेमें भी समर्थ नहीं हैं ॥ ८ ॥

सेनासमुदयं कृत्वा पार्थिवं मधुसूदन । कृतार्थं मन्यते बाल आत्मानमविचक्षणः ॥ ९ ॥ ‘मधुसूदन! मूर्ख एवं बुद्धिहीन दुर्योधन राजाओंकी सेना एकत्र करके अपने-आपको कृतकृत्य मानता है ।।

एकः कर्णः पराज्जेतुं समर्थ इति निश्चितम् । धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेः स शमं नोपयास्यति ॥ १० ॥ ‘दुर्बुद्धि दुर्योधनको तो इस बातका भी दृढ़ विश्वास है कि अकेला कर्ण ही शत्रुओंको जीतनेमें समर्थ है; इसलिये वह कदापि संधि नहीं करेगा ॥ १० ॥

संविच्च धार्तराष्ट्राणां सर्वेषामेव केशव । शमे प्रयतमानस्य तव सौभ्रात्रकाङ्क्षिणः ॥ ११ ॥ न पाण्डवानामस्माभिः प्रतिदेयं यथोचितम् । इति व्यवसितास्तेषु वचनं स्यान्निरर्थकम् ॥ १२ ॥ ‘केशव! धृतराष्ट्रके सभी पुत्रोंने यह पक्का विचार कर लिया है कि हमें पाण्डवोंको उनका यथोचित राज्यभाग नहीं देना चाहिये। यही उनका दृढ़ निश्चय है। इधर आप संधिके लिये प्रयत्न करते हुए उनमें उत्तम भ्रातृभाव जगाना चाहते हैं; परंतु उन दुष्टोंके प्रति आप जो कुछ भी कहेंगे, वह सब व्यर्थ ही होगा ॥ ११-१२ ॥

यत्र सूक्तं दुरुक्तं च समं स्यान्मधुसूदन । न तत्र प्रलपेत् प्राज्ञो बधिरेष्विव गायनः ॥ १३ ॥ ‘मधुसूदन! जहाँ अच्छी और बुरी बातोंका एक-सा ही परिणाम हो, वहाँ विद्वान् पुरुषको कुछ नहीं कहना चाहिये। वहाँ कोई बात कहना बहरोंके आगे राग अलापनेके समान व्यर्थ ही है ॥ १३ ॥

अविजानत्सु मूढेषु निर्मर्यादेषु माधव ।