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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished3,237 pages

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पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

अश्वत्थामाका घोर युद्ध, सात्यकिके सारथिका वध एवं युधिष्ठिरका अश्वत्थामाको छोड़कर दूसरी ओर चले जाना

संजय उवाच

द्रौणिर्युधिष्ठिरं दृष्ट्वा शैनेयेनाभिरक्षितम् ।
द्रौपदेयैस्तथा शूरैरभ्यवर्तत हृष्टवत् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! सात्यकि तथा शूरवीर द्रौपदीपुत्रोंद्वारा सुरक्षित युधिष्ठिरको देखकर अश्वत्थामा बड़े हर्षके साथ उनका सामना करनेके लिये गया ॥ १ ॥
किरन्निषुगणान् घोरान् स्वर्णपुङ्खाञ्शिलाशितान् ।
दर्शयन् विविधान् मार्गान् शिक्षाञ्च लघुहस्तवत् ॥ २ ॥
ततः खं पूरयामास शरैर्दिव्यास्त्रमन्त्रितैः ।
युधिष्ठिरं च समरे परिवार्य महास्त्रवित् ॥ ३ ॥
वह बड़े-बड़े अस्त्रोंका ज्ञाता था; इसलिये शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले योद्धाके समान सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखोंसे युक्त भयंकर शरसमूहोंकी वर्षा करता और नाना प्रकारके मार्ग एवं शिक्षाका प्रदर्शन करता हुआ दिव्यास्त्रोंसे अभिमन्त्रित बाणोंद्वारा समरांगणमें युधिष्ठिरको अवरुद्ध करके आकाशको उन बाणोंसे भरने लगा ॥ २-३ ॥
द्रौणायनिशरच्छन्नं न प्राज्ञायत किञ्चन ।
बाणभूतमभूत् सर्वमायोधनशिरो महत् ॥ ४ ॥
द्रोणपुत्रके बाणोंसे आच्छन्न हो जानेके कारण वहाँ कुछ भी ज्ञात नहीं होता था। युद्धका वह सारा विशाल मैदान बाणमय हो रहा था ॥ ४ ॥
बाणजालं दिविच्छन्नं स्वर्णजालविभूषितम् ।
शुशुभे भरतश्रेष्ठ वितानमिव धिष्ठितम् ॥ ५ ॥
भरतश्रेष्ठ! स्वर्णजाल-विभूषित वह बाणोंका जाल आकाशमें फैलकर वहाँ तने हुए वितान (चँदोवे)-के समान सुशोभित होता था ॥ ५ ॥
तेनच्छन्नं नभो राजन् बाणजालेन भास्वता ।
अभ्रच्छायेव संजज्ञे बाणरुद्धे नभस्तले ॥ ६ ॥
राजन्! उन प्रकाशमान बाणसमूहोंसे सारा आकाशमण्डल ढक गया था। बाणोंसे रुँधे हुए आकाशमें मेघोंकी छाया-सी बन गयी थी ॥ ६ ॥
तत्राश्चर्यमपश्याम बाणभूते तथाविधे ।