महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextतौ दृष्ट्वा मातुलस्तत्र विरथौ परवीरहा । अभ्यभाषत राधेयं मद्रराजोऽनुकम्पया ॥ १५ ॥ शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले मामा मद्रराज शल्यने उन दोनों भाइयोंको रथहीन हुआ देख कृपापूर्वक राधापुत्र कर्णसे कहा— ॥ १५ ॥
योद्धव्यमद्य पार्थेन फाल्गुनेन त्वया सह । किमर्थं धर्मराजेन युध्यसे भृशरोषितः ॥ १६ ॥ ‘कर्ण! आज तुम्हें कुन्तीकुमार अर्जुनके साथ युद्ध करना है। फिर अत्यन्त रोषमें भरकर धर्मराजके साथ किसलिये जूझ रहे हो? ॥ १६ ॥
क्षीणशस्त्रास्त्रकवचः क्षीणबाणो विबाणधिः । श्रान्तसारथिवाहश्च च्छन्नोऽस्त्रैररिभिस्तथा ॥ १७ ॥ पार्थमासाद्य राधेय उपहास्यो भविष्यसि । ‘इनके अस्त्र-शस्त्र और कवच नष्ट हो गये हैं। तीर और तरकस भी कट गये हैं। सारथि और घोड़े भी थके हुए हैं तथा शत्रुओंने इन्हें अस्त्रोंद्वारा आच्छादित कर दिया है। राधानन्दन! अर्जुनके सामने पहुँचकर तुम उपहासके पात्र बन जाओगे’ ॥ १७ १/२ ॥
एवमुक्तोऽपि कर्णस्तु मद्रराजेन संयुगे ॥ १८ ॥ तथैव कर्णः संरब्धो युधिष्ठिरमताडयत् । शरैस्तीक्ष्णैः पराविध्य माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥ १९ ॥ प्रहस्य समरे कर्णश्चकार विमुखं शरैः । युद्धस्थलमें मद्रराज शल्यके ऐसा कहनेपर भी कर्ण पूर्ववत् रोषमें भरकर युधिष्ठिरको बाणोंद्वारा पीड़ित करता रहा। माद्रीकुमार पाण्डुपुत्र नकुल-सहदेवको तीखे बाणोंसे घायल करके कर्णने हँसकर समरांगणमें बाणोंके प्रहारसे युधिष्ठिरको युद्धसे विमुख कर दिया ॥ १८-१९ १/२ ॥
ततः शल्यः प्रहस्येदं कर्णं पुनरुवाच ह ॥ २० ॥ रथस्थमतिसंरब्धं युधिष्ठिरवधे धृतम् । तब शल्यने हँसकर युधिष्ठिरके वधका निश्चय किये अत्यन्त क्रोधमें भरकर रथपर बैठे हुए कर्णसे पुनः इस प्रकार कहा— ॥ २० १/२ ॥
यदर्थं धार्तराष्ट्रेण सततं मानितो भवान् ॥ २१ ॥ तं पार्थं जहि राधेय किं ते हत्वा युधिष्ठिरम् । ‘राधापुत्र! दुर्योधनने जिनसे जूझनेके लिये तुम्हारा सदा सम्मान किया है, उन कुन्तीकुमार अर्जुनको मारो। युधिष्ठिरका वध करनेसे तुम्हें क्या मिलेगा? ॥ २१ १/२ ॥
(हते ह्यस्मिन् ध्रुवं पार्थः सर्वाञ्जेष्यति नो रथान् । तस्मिन् हि धार्तराष्ट्रस्य निहते तु ध्रुवो जयः ॥