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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished3,237 pages

Page 2101 of 3237

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Page 2101

‘महाबाहु श्रीकृष्ण! यह भार्गवास्त्रका पराक्रम देखिये। समरांगणमें किसी तरह इस अस्त्रको नष्ट नहीं किया जा सकता ॥ ६१ ॥ सूतपुत्रं च संरब्धं पश्य कृष्ण महारणे । अन्तकप्रतिमं वीर्ये कुर्वाणं कर्म दारुणम् ॥ ६२ ॥ ‘श्रीकृष्ण! देखिये, क्रोधमें भरा हुआ सूतपुत्र, जो पराक्रममें यमराजके समान है, महासमरमें कैसा दारुण कर्म कर रहा है ॥ ६२ ॥ अभीक्ष्णं चोदयन्नश्वान् प्रेक्षते मां मुहुर्मुहुः । न च पश्यामि समरे कर्णं प्रति पलायितुम् ॥ ६३ ॥ ‘वह निरन्तर घोड़ोंको हाँकता हुआ बारंबार मेरी ही ओर देख रहा है। समरभूमिमें कर्णके सामनेसे पलायन करना मैं उचित नहीं समझता ॥ ६३ ॥ जीवन् प्राप्नोति पुरुषः संख्ये जयपराजयौ । मृतस्य तु हृषीकेश भङ्ग एव कुतो जयः ॥ ६४ ॥ ‘मनुष्य जीवित रहे तो वह युद्धमें विजय और पराजय दोनों पाता है। हृषीकेश! मरे हुए मनुष्यका तो नाश ही हो जाता है; फिर उसकी विजय कहाँसे हो सकती है’ ॥ ६४ ॥ एवमुक्तस्तु पार्थेन कृष्णो मतिमतां वरम् । धनंजयमुवाचेदं प्राप्तकालमरिंदमम् ॥ ६५ ॥ अर्जुनके ऐसा कहनेपर श्रीकृष्णने बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ शत्रुदमन अर्जुनसे यह समयोचित बात कही— ॥ ६५ ॥ कर्णेन हि दृढं राजा कुन्तीपुत्रः परिक्षतः । तं दृष्ट्वाऽऽश्वास्य च पुनः कर्णं पार्थ वधिष्यसि ॥ ६६ ॥ ‘पार्थ! कर्णने राजा युधिष्ठिरको अत्यन्त क्षत-विक्षत कर दिया है। उनसे मिलकर उन्हें धीरज बँधाकर फिर तुम कर्णका वध करना’ ॥ ६६ ॥ एवमुक्त्वा पुनः प्रायाद् द्रष्टुमिच्छन् युधिष्ठिरम् । श्रमेण ग्राहयिष्यंश्च युद्धे कर्णं विशाम्पते ॥ ६७ ॥ प्रजानाथ! ऐसा कहकर वे पुनः युधिष्ठिरसे मिलनेकी इच्छासे तथा कर्णको युद्धमें अधिक थकावट प्राप्त करानेके लिये वहाँसे चल दिये ॥ ६७ ॥ ततो धनंजयो द्रष्टुं राजानं बाणपीडितम् । रथेन प्रययौ क्षिप्रं संग्रामात् केशवाज्ञया ॥ ६८ ॥ तत्पश्चात् अर्जुन श्रीकृष्णकी आज्ञासे बाणपीड़ित राजा युधिष्ठिरको देखनेके लिये रथके द्वारा युद्धस्थलसे शीघ्रतापूर्वक गये ॥ ६८ ॥ गच्छन्नेव तु कौन्तेयो धर्मराजदिदृक्षया । सैन्यमालोकयामास नापश्यत् तत्र चाग्रजम् ॥ ६९ ॥ युद्धं कृत्वा तु कौन्तेयो द्रोणपुत्रेण भारत ।