महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextदुरात्मा कर्णको मार डाला? ।। ४० ।। कच्चित्त्वया तस्य सुमन्दबुद्धे- र्गाण्डीवमुक्तैर्विशिखैर्ज्वलद्भिः । सकुण्डलं भानुमदुत्तमाङ्गं कायात् प्रकृत्तं युधि सव्यसाचिन् ।। ४१ ।। सव्यसाची अर्जुन! क्या तुमने युद्धस्थलमें गाण्डीव धनुषसे छोड़े गये प्रज्वलित बाणोंद्वारा उस मन्दबुद्धि कर्णके कुण्डलमण्डित तेजस्वी मस्तकको धड़से काट गिराया? ।। ४१ ।। यत्तन्मया बाणसमर्पितेन ध्यातोऽसि कर्णस्य वधाय वीर । तन्मे त्वया कच्चिदमोधमद्य ध्यानं कृतं कर्णनिपातनेन ।। ४२ ।। वीर! जिस समय मैं बाणोंसे घायल कर दिया गया, उस समय कर्णके वधके लिये मैंने तुम्हारा चिन्तन किया था। क्या तुमने कर्णको धराशायी करके मेरे उस चिन्तनको आज सफल बना दिया? ।। ४२ ।। यद् दर्पपूर्णः स सुयोधनोऽस्मा- नुदीक्षते कर्णसमाश्रयेण । कच्चित् त्वया सोऽद्य समाश्रयोऽस्य भग्नः पराक्रम्य सुयोधनस्य ।। ४३ ।। कर्णका आश्रय लेकर दुर्योधन जो बड़े घमंडमें भरकर हमलोगोंकी ओर देखा करता था। क्या तुमने दुर्योधनके उस महान् आश्रयको आज पराक्रम करके नष्ट कर दिया? ।। ४३ ।। यो नः पुरा षण्ढतिलानवोचत् सभामध्ये कौरवाणां समक्षम् । स दुर्मतिः कच्चिदुपेत्य संख्ये त्वया हतः सूतपुत्रो ह्यमर्षी ।। ४४ ।। जिसने पूर्वकालमें सभाभवनके भीतर कौरवोंकी आँखोंके सामने हमें थोथे तिलोंके समान नपुंसक बताया था वह अमर्षशील दुर्बुद्धि सूतपुत्र क्या आज युद्धमें आकर तुम्हारे हाथसे मारा गया? ।। ४४ ।। यः सूतपुत्रः प्रहसन् दुरात्मा पुराब्रवीन्निर्जितां सौबलेन । स्वयं प्रसह्यानय याज्ञसेनी- मपीह कच्चित् स हतस्त्वयाद्य ।। ४५ ।।