महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextजो झूठी शपथ खानेपर भी लुटेरोंके साथ बन्धनमें पड़नेसे छुटकारा पा सके, उसके लिये वहाँ असत्य बोलना ही ठीक है। उसे बिना विचारे सत्य समझना चाहिये ।। ६३ ½ ।। न च तेभ्यो धनं देयं शक्ये सति कथंचन ।। ६४ ।। पापेभ्यो हि धनं दत्तं दातारमपि पीडयेत् । जहाँतक वश चले, किसी तरह उन लुटेरोंको धन नहीं देना चाहिये; क्योंकि पापियोंको दिया हुआ धन दाताको भी दुःख देता है ।। ६४ ½ ।। तस्माद् धर्मार्थमनृतमुक्त्वा नानृतभाग् भवेत् ।। ६५ ।। एष ते लक्षणोद्देशो मयोद्दिष्टो यथाविधि । यथाधर्मं यथाबुद्धि मयाद्य वै हितार्थिना ।। ६६ ।। एतच्छ्रुत्वा ब्रूहि पार्थ यदि वध्यो युधिष्ठिरः । अतः धर्मके लिये झूठ बोलनेपर मनुष्य असत्यभाषणके दोषका भागी नहीं होता। अर्जुन! मैं तुम्हारा हित चाहता हूँ, इसलिये आज मैंने अपनी बुद्धि और धर्मके अनुसार संक्षेपसे तुम्हारे लिये यह विधिपूर्वक धर्माधर्मके निर्णयका संकेत बताया है। यह सुनकर अब तुम्हीं बताओ, क्या अब भी राजा युधिष्ठिर तुम्हारे वध्य हैं ।। ६५-६६ ½ ।।
अर्जुन उवाच
यथा ब्रूयान्महाप्राज्ञो यथा ब्रूयान्महामतिः ।। ६७ ।। हितं चैव यथास्माकं तथैतद् वचनं तव । **अर्जुन बोले—**प्रभो! कोई बहुत बड़ा विद्वान् और परम बुद्धिमान् मनुष्य जैसा उपदेश दे सकता है तथा जिसके अनुसार आचरण करनेसे हमलोगोंका हित हो सकता है, वैसा ही आपका यह भाषण हुआ है ।। भवान् मातृसमोऽस्माकं तथा पितृसमोऽपि च ।। ६८ ।। गतिश्च परमा कृष्ण त्वमेव च परायणम् । श्रीकृष्ण! आप हमारे माता-पिताके तुल्य हैं। आप ही परमगति और परम आश्रय हैं ।। ६८ ½ ।। न हि ते त्रिषु लोकेषु विद्यतेऽविदितं क्वचित् ।। ६९ ।। तस्माद् भवान् परं धर्मं वेद सर्वं यथातथम् । तीनों लोकोंमें कहीं कोई भी ऐसी बात नहीं है जो आपको विदित न हो; अतः आप ही परम धर्मको सम्पूर्ण और यथार्थरूपसे जानते हैं ।। ६९ ½ ।। अवध्यं पाण्डवं मन्ये धर्मराजं युधिष्ठिरम् ।। ७० ।। अस्मिंस्तु मम संकल्पे ब्रूहि किंचिदनुग्रहम् । इदं वा परमात्रैव शृणु हृत्स्थं विवक्षितम् ।। ७१ ।।