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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished3,237 pages

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उत्तर दिशाके वीर मारे गये, पश्चिमके योद्धाओंका संहार हो गया, पूर्वदेशके क्षत्रिय नष्ट हो गये और दक्षिणदेशीय योद्धा काट डाले गये। शत्रुओंके और हमारे पक्षके बड़े-बड़े योद्धाओंने युद्धमें ऐसा पराक्रम किया है, जिसकी कहीं तुलना नहीं है ॥ २० ॥ त्वं देवितात्वत्कृते राज्यनाश- स्त्वत्सम्भवं नो व्यसनं नरेन्द्र । मास्मान् क्रूरैर्वाक्प्रतोदैस्तुदंस्त्वं भूयो राजन् कोपयेस्त्वल्पभाग्यः ॥ २१ ॥ नरेन्द्र! तू भाग्यहीन जुआरी है। तेरे ही कारण हमारे राज्यका नाश हुआ और तुझसे ही हमें घोर संकटकी प्राप्ति हुई। राजन्! अब तू अपने वचनरूपी चाबुकोंसे हमें पीड़ा देते हुए फिर कुपित न कर ॥ २१ ॥

संजय उवाच

एता वाचः परुषाः सव्यसाची स्थिरप्रज्ञः श्रावयित्वा तु रूक्षाः । बभूवासौ विमना धर्मभीरुः कृत्वा प्राज्ञः पातकं किंचिदेवम् ॥ २२ ॥ **संजय कहते हैं—**राजन्! सव्यसाची अर्जुन धर्मभीरु हैं। उनकी बुद्धि स्थिर है तथा वे उत्तम ज्ञानसे सम्पन्न हैं। उस समय राजा युधिष्ठिरको वैसी रूखी और कठोर बातें सुनाकर वे ऐसे अनमने और उदास हो गये, मानो कोई पातक करके इस प्रकार पछता रहे हों ॥ २२ ॥ तदानुतेपे सुरराजपुत्रो विनिःश्वसंश्चासिमथोद्धबर्ह । तमाह कृष्णः किमिदं पुनर्भवान् विकोशमाकाशनिभं करोत्यसिम् ॥ २३ ॥ ब्रवीहि मां त्वं पुनरुत्तरं वच- स्तथा प्रवक्ष्याम्यहमर्थसिद्धये । देवराजकुमार अर्जुनको उस समय बड़ा पश्चात्ताप हुआ। उन्होंने लंबी साँस खींचते हुए फिरसे तलवार खींच ली। यह देख भगवान् श्रीकृष्णने कहा—'अर्जुन! यह क्या? तुम आकाशके समान निर्मल इस तलवारको पुनः क्यों म्यानसे बाहर निकाल रहे हो? तुम मुझे मेरी बातका उत्तर दो। मैं तुम्हारा अभीष्ट अर्थ सिद्ध करनेके लिये पुनः कोई योग्य उपाय बताऊँगा' ॥ २३ १/२ ॥ इत्येवमुक्तः पुरुषोत्तमेन सुदुःखितः केशवमर्जुनोऽब्रवीत् ॥ २४ ॥