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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished3,237 pages

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‘आज तुम्हारे बाणोंसे पीड़ित हुए भूमिपाल दीन और विषादयुक्त होकर हाहाकार मचाते हुए कर्णको रथसे नीचे गिरता देखें ।। ९५ १/२ ।।

अद्य शोणितसम्मग्नं शयानं पतितं भुवि ॥ ९६ ॥ अपविद्धायुधं कर्णं दीनाः पश्यन्तु बान्धवाः । ‘आज कर्ण रक्तमें डूबकर पृथ्वीपर पड़ा सो रहा हो और उसके आयुध इधर-उधर फेंके पड़े हों। इस अवस्थामें उसके बन्धु-बान्धव दीन-दुःखी होकर उसे देखें ।। ९६ १/२ ।।

हस्तिकक्षो महानस्य भल्लेनोन्मथितस्त्वया । प्रकम्पमानः पततु भूमावाधिरथेर्ध्वजः ॥ ९७ ॥ ‘आज हाथीके रस्सेके चिह्नसे युक्त अधिरथपुत्र कर्णका विशाल ध्वज तुम्हारे भल्लसे कटकर काँपता हुआ इस पृथ्वीपर गिर पड़े ।। ९७ ।।

त्वया शरशतैश्छिन्नं रथं हेमविभूषितम् । हतयोधाश्वमुत्सृज्य भीतः शल्यः पलायताम् ॥ ९८ ॥ ‘आज राजा शल्य भी तुम्हारे सैकड़ों बाणोंसे छिन्न-भिन्न उस सुवर्णविभूषित रथको, जिसके रथी और घोड़े मार डाले गये हों, छोड़कर भयभीत हो भाग जायँ ।। ९८ ।।

त्वं चेत् कर्णसुतं पार्थ सूतपुत्रस्य पश्यतः । प्रतिज्ञावारणार्थाय निहनिष्यसि सायकैः ॥ ९९ ॥ हतं कर्णस्तु तं दृष्ट्वा प्रियं पुत्रं दुरात्मवान् । स्मरतां द्रोणभीष्माभ्यां वचः क्षत्तुश्च मानद ॥ १०० ॥ ‘माननीय पुरुषोंको मान देनेवाले पार्थ! यदि तुम सूतपुत्र कर्णके देखते-देखते अपनी प्रतिज्ञाकी पूर्तिके लिये उसके पुत्र वृषसेनको बाणोंद्वारा मार डालो तो अपने प्रिय पुत्रको मारा गया देख वह दुरात्मा कर्ण द्रोणाचार्य, भीष्म और विदुरजीकी कही हुई बातोंको याद करे ।। ९९-१०० ।।

ततः सुयोधनो दृष्ट्वा हतमाधिरथिं त्वया । निराशो जीविते त्वद्य राज्ये चैव भवत्वरिः ॥ १०१ ॥ ‘तत्पश्चात् आज तुम्हारे द्वारा अधिरथपुत्र कर्णको मारा गया देख तुम्हारा शत्रु दुर्योधन अपने जीवन और राज्य दोनोंसे निराश हो जाय ।। १०१ ।।

एते द्रवन्ति पञ्चाला वध्यमानाः शितैः शरैः । कर्णेन भरतश्रेष्ठ पाण्डवानुज्जिहीर्षवः ॥ १०२ ॥ ‘भरतश्रेष्ठ! कर्णके तीखे बाणोंकी मार खाते हुए भी ये पांचालवीर पाण्डव-सैनिकोंका उद्धार करनेकी इच्छासे (कर्णकी ओर ही) दौड़े जा रहे हैं ।। १०२ ।।

पञ्चालान् द्रौपदेयांश्च धृष्टद्युम्नशिखण्डिनौ । धृष्टद्युम्नतनूजांश्च शतानीकं च नाकुलिम् ॥ १०३ ॥ नकुलं सहदेवं च दुर्मुखं जनमेजयम् ।