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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished3,237 pages

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Page 2190

भूमिशोभां करिष्यामि पतितै रथकुञ्जरैः ।
‘नाना प्रकारके बाणोंका प्रहार करके मैं शत्रुसैनिकोंको भयभीत कर दूँगा। धनुषको कानतक खींचकर छोड़े गये यमराष्ट्रवर्धक बाणोंद्वारा धराशायी किये गये रथों और हाथियोंसे रणभूमिकी शोभा बढ़ाऊँगा ।। ३१ १/२ ।।
तत्राहं वै महासंख्ये सम्पन्नं युद्धदुर्मदम् ।। ३२ ।।
अद्य कर्णमहं घोरं सूदयिष्यामि सायकैः ।
‘मैं महासमरमें शक्तिसम्पन्न रणदुर्मद एवं भयंकर कर्णको आज अपने बाणोंद्वारा मार डालूँगा ।। ३२ १/२ ।।
अद्य कर्णे हते कृष्ण धार्तराष्ट्राः सराजकाः ।। ३३ ।।
विद्रवन्तु दिशो भीताः सिंहत्रस्ता मृगा इव ।
‘श्रीकृष्ण! आज कर्णके मारे जानेपर राजासहित धृतराष्ट्रके सभी पुत्र सिंहसे डरे हुए मृगोंके समान भयभीत हो सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग जायें ।। ३३ १/२ ।।
अद्य दुर्योधनो राजा आत्मानं चानुशोचताम् ।। ३४ ।।
हते कर्णे मया संख्ये सपुत्रे ससुहृज्जने ।
‘आज युद्धस्थलमें पुत्रों और सुहृदोंसहित कर्णके मेरे द्वारा मारे जानेपर राजा दुर्योधन अपने लिये निरन्तर शोक करे ।।
अद्य कर्णं हतं दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रोऽत्यमर्षणः ।। ३५ ।।
जानातु मां रणे कृष्ण प्रवरं सर्वधन्विनाम् ।
‘श्रीकृष्ण! अमर्षशील दुर्योधन आज कर्णको रणभूमिमें मारा गया देख मुझे सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ समझ ले ।। ४५ १/२ ।।
सपुत्रपौत्रं सामात्यं सभृत्यं च निराशिषम् ।। ३६ ।।
अद्य राज्ये करिष्यामि धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् ।
‘मैं आज ही पुत्र, पौत्र, मन्त्री और सेवकोंसहित राजा धृतराष्ट्रको राज्यकी ओरसे निराश कर दूँगा ।। ३६ १/२ ।।
अद्य कर्णस्य चक्राङ्गाः क्रव्यादाश्च पृथग्विधाः ।। ३७ ।।
शरैश्छिन्नानि गात्राणि विहरिष्यन्ति केशव ।
‘केशव! आज चक्रवाक तथा भिन्न-भिन्न मांसभोजी पक्षी बाणोंसे कटे हुए कर्णके अंगोंको उठा ले जायँगे ।।
अद्य राधासुतस्याहं संग्रामे मधुसूदन ।। ३८ ।।
शिरश्छेत्स्यामि कर्णस्य मिषतां सर्वधन्विनाम् ।
‘मधुसूदन! आज संग्राममें समस्त धनुर्धरोंके देखते-देखते मैं राधापुत्र कर्णका मस्तक काट डालूँगा ।।