महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
Page 2225 of 3237
Read in contextपञ्चालानां रथश्रेष्ठांन् द्रावयन् शात्रवांस्तथा ।
कर्णस्तु समरे योधांस्त्रासयन् सुमहायशाः ॥ ४९ ॥
कालयामास तत् सैन्यं यथा पशुगणान् वृकः ।
जैसे वनमें कुपित हुआ सिंह मृगसमूहोंको खदेड़ता रहता है, उसी प्रकार शत्रुपक्षके
पांचाल महारथियोंको भगाता हुआ महायशस्वी कर्ण समरांगणमें समस्त योद्धाओंको त्रास
देने लगा। जैसे भेड़िया पशुसमूहोंको भयभीत करके भगा देता है, उसी प्रकार कर्णने
पाण्डवसेनाको खदेड़ दिया ।।
दृष्ट्वा तु पाण्डवीं सेनां धार्तराष्ट्राः पराङ्मुखीम् ॥ ५० ॥
तत्राजग्मुर्महेष्वासा रुवन्तो भैरवान् रवान् ।
पाण्डव-सेनाको युद्धसे विमुख हुई देख आपके महाधनुर्धर पुत्र भीषण गर्जना करते
हुए वहाँ आ पहुँचे ।।
दुर्योधनो हि राजेन्द्र मुदा परमया युतः ॥ ५१ ॥
वादयामास संहृष्टो नानावाद्यानि सर्वशः ।
राजेन्द्र! उस समय दुर्योधनको बड़ी प्रसन्नता हुई। वह हर्षमें भरकर सब ओर नाना
प्रकारके बाजे बजवाने लगा ।।
पञ्चालापि महेष्वासा भग्नास्तत्र नरोत्तमाः ॥ ५२ ॥
न्यवर्तन्त यथा शूरं मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् ।
उस समय वहाँ भगे हुए महाधनुर्धर नरश्रेष्ठ पांचाल मृत्युको ही युद्धसे लौटनेकी अवधि
निश्चित करके पुनः सूतपुत्र कर्णसे जूझनेके लिये लौट आये ।।
तान् निवृत्तान् रणे शूरान् राधेयः शत्रुतापनः ॥ ५३ ॥
अनेकशो महाराज बभञ्ज पुरुषर्षभः ।
महाराज! शत्रुओंको संताप देनेवाला पुरुषश्रेष्ठ राधापुत्र कर्ण उन लौटे हुए शूरवीरोंको
रणभूमिमें बारंबार भगा देता था ।। ५३ १/२ ।।
तत्र भारत कर्णेन पञ्चाला विंशती रथाः ॥ ५४ ॥
निहताः सायकैः क्रोधाच्चेदयश्च परः शताः ।
भरतनन्दन! कर्णने वहाँ बाणोंद्वारा बीस पांचाल रथियों और सौसे भी अधिक
चेदिदेशीय योद्धाओंको क्रोधपूर्वक मार डाला ।। ५४ १/२ ।।
कृत्वा शून्यान् रथोपस्थान् वाजिपृष्ठांश्च भारत ॥ ५५ ॥
निर्मनुष्यान् गजस्कन्धान् पादातांश्चैव विद्रुतान् ।
भारत! उसने रथकी बैठकें सूनी कर दीं, घोड़ोंकी पीठें खाली कर दीं, हाथियोंके पीठों
और कंधोंपर कोई मनुष्य नहीं रहने दिये और पैदलोंको भी मार भगाया ।। ५५ १/२ ।।
आदित्य इव मध्याह्ने दुर्निरीक्ष्यः परंतपः ॥ ५६ ॥
कालान्तकवपुः शूरः सूतपुत्रोऽभ्यराजत ।