महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
Page 2232 of 3237
Read in contextनानामृगसहस्राणां यूथं केसरिणां यथा ॥ ३० ॥ 'किरीटधारी अर्जुनने शत्रुसेनाको उसी प्रकार अत्यन्त व्याकुल कर दिया है, जैसे सिंह नाना जातिके सहस्रों मृगोंके झुंडको व्याकुल कर देता है ॥ ३० ॥ त्वामभिप्रेप्सुरायाति कर्ण निघ्नन् वरान् रथान् । असह्यमानो राधेय तं याहि प्रति भारत ॥ ३१ ॥ 'राधापुत्र कर्ण! अर्जुन बड़े-बड़े रथियोंका संहार करते हुए तुम्हें ही प्राप्त करनेके लिये इधर आ रहे हैं। ये शत्रुओंके लिये असह्य हैं। तुम इन भरतवंशी वीरका सामना करनेके लिये आगे बढ़ो ॥ ३१ ॥ (घृणां त्यक्त्वा प्रमादं च भृगोरस्त्रं च संस्मर । दृष्टिं मुष्टिं च संधानं स्मृत्वा रामोपदेशजम् । धनंजयं जयप्रेप्सुः प्रत्युद्गच्छ महारथम् ॥) 'कर्ण! तुम दया और प्रमाद छोड़कर भृगुवंशी परशुरामजीके दिये हुए अस्त्रका स्मरण करो, उनके उपदेशके अनुसार लक्ष्यकी ओर दृष्टि रखना, धनुषको अपनी मुट्ठीसे दृढ़तापूर्वक पकड़े रहना और बाणोंका संधान करना आदि बातें याद करके मनमें विजय पानेकी इच्छा लिये महारथी अर्जुनका सामना करनेके लिये आगे बढ़ो। एषा विदीर्यते सेना धार्तराष्ट्री समन्ततः । अर्जुनस्य भयात् तूर्णं निघ्नतः शात्रवान् बहून् ॥ ३२ ॥ 'अर्जुन थोड़ी ही देरमें बहुत-से शत्रुओंका संहार कर डालते हैं, इसलिये उनके भयसे दुर्योधनकी यह सेना चारों ओरसे छिन्न-भिन्न होकर भागी जा रही है ॥ ३२ ॥ वर्जयन् सर्वसैन्यानि त्वरते हि धनंजयः । त्वदर्थमिति मन्येऽहं यथास्योदीर्यते वपुः ॥ ३३ ॥ 'इस समय अर्जुनका शरीर जैसा उत्तेजित हो रहा है उससे मैं समझता हूँ कि वे सारी सेनाओंको छोड़कर तुम्हारे पास पहुँचनेके लिये जल्दी कर रहे हैं ॥ ३३ ॥ न ह्यवस्थास्यते पार्थो युयुत्सुः केनचित् सह । त्वामृते क्रोधदीप्तो हि पीड्यमाने वृकोदरे ॥ ३४ ॥ 'भीमसेनके पीड़ित होनेसे अर्जुन क्रोधसे तमतमा उठे हैं, इसलिये आज तुम्हारे सिवा और किसीसे युद्ध करनेके लिये वे नहीं रुक सकेंगे ॥ ३४ ॥ विरथं धर्मराजं तु दृष्ट्वा सुदृढविक्षतम् । शिखण्डिनं सात्यकिं च धृष्टद्युम्नं च पार्षतम् ॥ ३५ ॥ द्रौपदेयान् युधामन्युमुत्तमौजसमेव च । नकुलं सहदेवं च भ्रातरौ द्वौ समीक्ष्य च ॥ ३६ ॥ सहसैकरथः पार्थस्त्वामभ्येति परंतपः । क्रोधरक्तेक्षणः क्रुद्धो जिघांसुः सर्वपार्थिवान् ॥ ३७ ॥