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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished3,237 pages

Page 2236 of 3237

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Page 2236

सितैर्हयैः कौरवराजपुत्रः । स वाद्य मां नेष्यति कृच्छ्रमेतत् कर्णस्यान्तादेतदन्तास्तु सर्वे ॥ ५५ ॥ ये रथियोंमें प्रधान वीर कौरवराजकुमार अर्जुन अपने श्वेत अश्वोंद्वारा रणभूमिमें विचर रहे हैं। ये आज मुझे मृत्युके संकटमें डाल देंगे और मुझ कर्णका अन्त होनेपर कौरवदलके अन्य समस्त योद्धाओंका विनाश भी निश्चित ही है ॥ ५५ ॥

अस्वेदिनौ राजपुत्रस्य हस्ता- ववेपमानौ जातकिणौ बृहन्तौ । दृढायुधः कृतिमान् क्षिप्रहस्तो न पाण्डवेयेन समोऽस्ति योधः ॥ ५६ ॥ राजकुमार अर्जुनके दोनों विशाल हाथोंमें कभी पसीना नहीं होता, उनमें धनुषकी प्रत्यंचाके चिह्न बन गये हैं और वे दोनों हाथ कभी काँपते नहीं हैं। उनके अस्त्र-शस्त्र भी सुदृढ़ हैं। वे विद्वान् एवं शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले हैं। पाण्डुपुत्र अर्जुनके समान दूसरा कोई योद्धा नहीं है ॥ ५६ ॥

गृह्णात्यनेकानपि कङ्कपत्रा- नेकं यथा तान् प्रतियोज्य चाशु । ते क्रोशमात्रे निपतन्त्यमोघाः कस्तेन योधोऽस्ति समः पृथिव्याम् ॥ ५७ ॥ वे कंकपत्रयुक्त अनेक बाणोंको इस प्रकार हाथमें लेते हैं, मानो एक ही बाण हो और उन सबको शीघ्रतापूर्वक धनुषपर रखकर चला देते हैं। वे अमोघ बाण एक कोस दूर जाकर गिरते हैं; अतः इस पृथ्वीपर उनके समान दूसरा योद्धा कौन है? ॥ ५७ ॥

अतोषयत् खाण्डवे यो हुताशं कृष्णद्वितीयोऽतिरथस्तरस्वी । लेभे चक्रं यत्र कृष्णो महात्मा धनुर्गाण्डीवं पाण्डवः सव्यसाची ॥ ५८ ॥ उन वेगशाली और अतिरथी वीर अर्जुनने अपने दूसरे साथी श्रीकृष्णके साथ जाकर खाण्डववनमें अग्निदेवको तृप्त किया था, जहाँ महात्मा श्रीकृष्णको तो चक्र मिला और पाण्डुपुत्र सव्यसाची अर्जुनने गाण्डीव धनुष प्राप्त किया ॥ ५८ ॥

श्वेताश्वयुक्तं च सुघोषमुग्रं रथं महाबाहुरदीनसत्त्वः । महेषुधी चाक्षये दिव्यरूपे शस्त्राणि दिव्यानि च हव्यवाहात् ॥ ५९ ॥