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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished3,237 pages

Page 2254 of 3237

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Page 2254

नरेश्वर! भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर अर्जुनको तीन अंगोंवाली विशाल सेनासे घिरा देख भीमसेन मरनेसे बचे हुए आपके कतिपय रथियोंको छोड़कर बड़े वेगसे धनंजयके रथकी ओर दौड़े ॥ २१-२२ ॥ ततस्तत् प्राद्रवत् सैन्यं हतभूयिष्ठमातुरम् । दृष्ट्वार्जुनं तदा भीमो जगाम भ्रातरं प्रति ॥ २३ ॥ उस समय आपके अधिकांश सैनिक मारे जा चुके थे, बहुत-से घायल होकर आतुर हो गये थे। फिर तो कौरव-सेनामें भगदड़ मच गयी। यह सब देखते हुए भीमसेन अपने भाई अर्जुनके पास आ पहुँचे ॥ २३ ॥ हतावशिष्टांस्तुरगानर्जुनेन महाबलान् । भीमो व्यधमदश्रान्तो गदापाणिर्महाहवे ॥ २४ ॥ भीमसेन अभी थके नहीं थे, उन्होंने हाथमें गदा ले उस महासमरमें अर्जुनद्वारा मारे जानेसे बचे हुए महाबली घोड़ों और सवारोंका संहार कर डाला ॥ २४ ॥ कालरात्रिमिवात्युग्रां नरनागाश्वभोजनाम् । प्राकाराट्टपुरद्वारदारणीमतिदारुणाम् ॥ २५ ॥ ततो गदां नृनागाश्वेष्वाशु भीमो व्यवासृजत् । सा जघान बहूनश्वांश्चारोहांश्च मारिष ॥ २६ ॥ मान्यवर नरेश! तदनन्तर भीमसेनने कालरात्रिके समान अत्यन्त भयंकर, मनुष्यों, हाथियों और घोड़ोंको कालका ग्रास बनानेवाली, परकोटों, अट्टालिकाओं और नगरद्वारोंको भी विदीर्ण कर देनेवाली अपनी अति दारुण गदाका वहाँ मनुष्यों, गजराजों तथा अश्वोंपर तीव्रवेगसे प्रहार किया। उस गदाने बहुत-से घोड़ों और घुड़सवारोंका संहार कर डाला ॥ कार्ष्णायसतनूत्राणान् नरानश्वांश्च पाण्डवः । पोथयामास गदया सशब्दं तेऽपतन् हताः ॥ २७ ॥ पाण्डुपुत्र भीमने काले लोहेका कवच पहने हुए बहुत-से मनुष्यों और अश्वोंको भी गदासे मार गिराया। वे सब-के-सब आर्तनाद करते हुए प्राणशून्य होकर गिर पड़े ॥ दन्तैर्दशन्तो वसुधां शेरते क्षतजोक्षिताः । भग्नमूर्धास्थिचरणाः क्रव्यादगणभोजनाः ॥ २८ ॥ घायल हुए कौरव-सैनिक खूनसे नहाकर दाँतोंसे ओठ चबाते हुए धरतीपर सो गये थे, किन्हींका माथा फट गया था, किन्हींकी हड्डियाँ चूर-चूर हो गयी थीं और किन्हींके पाँव उखड़ गये थे। वे सब-के-सब मांसभक्षी पशुओंके भोजन बन गये थे ॥ २८ ॥ असृङ्मांसवसाभिश्च तृप्तिमभ्यागता गदा । अस्थीन्यप्यश्नती तस्थौ कालरात्रीव दुर्द्दशा ॥ २९ ॥ वह गदा दुर्लक्ष्य कालरात्रिके समान शत्रुओंके रक्त, मांस और चर्बीसे तृप्त होकर उनकी हड्डियोंको भी चबाये जा रही थी ॥ २९ ॥