महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
Page 2258 of 3237
Read in contextअर्जुनने बलपूर्वक आपकी सेनाको भगा दिया है—यह देखकर कर्ण शत्रुओंका वध करनेकी इच्छासे धनुष तानकर खड़ा हो गया ।। ५२ ।।
तान् प्रद्रुतान् कुरून् दृष्ट्वा कर्णः शस्त्रभृतां वरः ।
संचिन्त्ययित्वा पार्थस्य वधे दध्रे मनःश्वसन् ।। ५३ ।।
शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ कर्णने कौरव-सैनिकोंको भागते देख खूब सोच-विचारकर लंबी साँस लेते हुए मन-ही-मन अर्जुनके वधका निश्चय किया ।। ५३ ।।
विस्फार्य सुमहच्चापं ततश्चाधिरथिर्वृषः ।
पञ्चालान् पुनराधावत् पश्यतः सव्यसाचिनः ।। ५४ ।।
तत्पश्चात् धर्मात्मा अधिरथपुत्र कर्णने अपने विशाल धनुषको फैलाकर अर्जुनके देखते-देखते पुनः पांचाल-योद्धाओंपर धावा किया ।। ५४ ।।
ततः क्षणेन क्षितिपाः क्षतजप्रतिमेक्षणाः ।
कर्णं ववर्षुर्बाणौघैर्यथा मेघा महीधरम् ।। ५५ ।।
यह देख पांचालनरेशोंके नेत्र रोषसे लाल हो गये। जैसे बादल पर्वतपर पानी बरसाते हैं, उसी प्रकार वे क्षणभरमें कर्णपर बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगे ।। ५५ ।।
ततः शरसहस्राणि कर्णमुक्तानि मारिष ।
व्ययोजयन्त पञ्चालान् प्राणैः प्राणभृतां वर ।। ५६ ।।
प्राणधारियोंमें श्रेष्ठ मान्यवर नरेश! तदनन्तर कर्णके छोड़े हुए सहस्रों बाण पांचालोंको प्राणहीन करने लगे ।। ५६ ।।
तत्र शब्दो महानासीत् पञ्चालानां महामते ।
वध्यतां सूतपुत्रेण मित्रार्थे मित्रगृद्धिना ।। ५७ ।।
महामते! वहाँ मित्रका हित चाहनेवाले सूतपुत्र कर्णके द्वारा मित्रकी ही भलाईके लिये मारे जानेवाले पांचालोंका महान् आर्तनाद होने लगा ।। ५७ ।।
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे एकाशीतितमोऽध्यायः ।। ८१ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुलयुद्धविषयक इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८१ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ६० श्लोक हैं।)