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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished3,237 pages

Page 2308 of 3237

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Page 2308

एतेऽभवन्नर्जुनतः क्षुद्रसर्पाश्च कर्णतः । महाराज! मुनि, चारण, सिद्ध, गरुड़, पक्षी, रत्न, निधियाँ, उपवेद, उपनिषद्, रहस्य, संग्रह और इतिहास-पुराणसहित सम्पूर्ण वेद, वासुकि, चित्रसेन, तक्षक, मणिक, सम्पूर्ण सर्पगण, अपने वंशजोंसहित कद्रूकी संतानें, विषैले नाग, ऐरावत, सौरभेय और वैशालेय सर्प—ये सब अर्जुनके पक्षमें हो गये। छोटे-छोटे सर्प कर्णका साथ देने लगे ॥ ४१—४४ १/२ ॥

ईहामृगा व्यालमृगा माङ्गल्याश्च मृगद्विजाः ॥ ४५ ॥ पार्थस्य विजये राजन् सर्व एवाभिसंसृताः । राजन्! ईहामृग, व्यालमृग, मंगलसूचक मृग, पशु और पक्षी, सिंह तथा व्याघ्र—ये सब-के-सब अर्जुनकी ही विजयका आग्रह रखने लगे ॥ ४५ १/२ ॥

वसवो मरुतः साध्या रुद्रा विश्वेऽश्विनौ तथा ॥ ४६ ॥ अग्निरिन्द्रश्च सोमश्च पवनोऽथ दिशो दश । धनंजयस्य ते पक्षे आदित्याः कर्णतोऽभवन् ॥ ४७ ॥ विशः शूद्राश्च सूताश्च ये च संकरजातयः । सर्वशस्ते महाराज राधेयमभजंस्तदा ॥ ४८ ॥ वसु, मरुद्गण, साध्य, रुद्र, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, अग्नि, इन्द्र, सोम, पवन और दसों दिशाएँ अर्जुनके पक्षमें हो गये एवं (इन्द्रके सिवा अन्य) आदित्यगण कर्णके पक्षमें हो गये। महाराज! वैश्य, शूद्र, सूत तथा संकर जातिके लोग सब प्रकारसे उस समय राधापुत्र कर्णको ही अपनाने लगे ॥ ४६—४८ ॥

देवास्तु पितृभिः सार्धं सगणाः सपदानुगाः । यमो वैश्रवणश्चैव वरुणश्च यतोऽर्जुनः ॥ ४९ ॥ ब्रह्म क्षत्रं च यज्ञाश्च दक्षिणाश्चार्जुनं श्रिताः । अपने गणों और सेवकोंसहित देवता, पितर, यम, कुबेर और वरुण अर्जुनके पक्षमें थे। ब्राह्मण, क्षत्रिय, यज्ञ और दक्षिणा आदिने भी अर्जुनका ही साथ दिया ॥ ४९ १/२ ॥

प्रेताश्चैव पिशाचाश्च क्रव्यादाश्च मृगाण्डजाः ॥ ५० ॥ राक्षसाः सह यादोभिः श्वसृगालाश्च कर्णतः । प्रेत, पिशाच, मांसभोजी पशु-पक्षी, राक्षस, जल-जन्तु, कुत्ते और सियार—ये कर्णके पक्षमें हो गये ॥ ५० १/२ ॥

देवब्रह्मन्नृपर्षीणां गणाः पाण्डवतोऽभवन् ॥ ५१ ॥ तुम्बुरुप्रमुखा राजन् गन्धर्वाश्च यतोऽर्जुनः । प्राधेयाः सहमौनेया गन्धर्वाप्सरसां गणाः ॥ ५२ ॥ राजन्! देवर्षि, ब्रह्मर्षि तथा राजर्षियोंके समुदाय पाण्डुपुत्र अर्जुनके पक्षमें थे। तुम्बुरु आदि गन्धर्व, प्राधा और मुनिसे उत्पन्न हुए गन्धर्व एवं अप्सराओंके समुदाय भी अर्जुनकी