महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextदिदृक्षवः समाजग्मुः कर्णार्जुनसमागमम् । क्रीड़ामृग, पक्षीसमुदाय तथा हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंसहित दिव्य मनीषी पुरुष वायु तथा बादलोंको वाहन बनाकर कर्ण और अर्जुनका युद्ध देखनेके लिये वहाँ पधारे थे॥ ५३ १/२ ॥ देवदानवगन्धर्वा नागयक्षाः पतत्रिणः ॥ ५४ ॥ महर्षयो वेदविदः पितरश्च स्वधाभुजः । तपोविद्यास्तथौषध्यो नानारूपबलान्विताः ॥ ५५ ॥ अन्तरिक्षे महाराज विनदन्तोऽवतस्थिरे । महाराज! देवता, दानव, गन्धर्व, नाग, यक्ष, पक्षी, वेदज्ञ महर्षि, स्वधाभोजी पितर, तप, विद्या तथा नाना प्रकारके रूप और बलसे सम्पन्न ओषधियाँ—ये सब-के-सब कोलाहल मचाते हुए अन्तरिक्षमें खड़े हुए थे॥ ब्रह्मा ब्रह्मर्षिभिः सार्धं प्रजापतिभिरेव च ॥ ५६ ॥ भवश्चैव स्थितो याने दिव्ये तं देशमागमत् । ब्रह्मर्षियों तथा प्रजापतियोंके साथ ब्रह्मा और महादेवजी भी दिव्य विमानपर स्थित हो उस प्रदेशमें आये॥ समेतौ तौ महात्मानौ दृष्ट्वा कर्णधनंजयौ ॥ ५७ ॥ अर्जुनो जयतां कर्णमिति शक्रोऽब्रवीत्तदा । उन दोनों महामनस्वी वीर कर्ण और अर्जुनको एकत्र हुआ देख उस समय इन्द्र बोल उठे—‘अर्जुन कर्णपर विजय प्राप्त करें’॥ ५७ १/२ ॥ जयतामर्जुनं कर्ण इति सूर्योऽभ्यभाषत ॥ ५८ ॥ हत्वार्जुनं मम सुतः कर्णो जयतु संयुगे । हत्वा कर्णं जयत्वद्य मम पुत्रो धनंजयः ॥ ५९ ॥ यह सुनकर सूर्यदेव कहने लगे—‘नहीं, कर्ण ही अर्जुनको जीत ले। मेरा पुत्र कर्ण युद्धस्थलमें अर्जुनको मारकर विजय प्राप्त करे।’ (इन्द्र बोले—) ‘नहीं, मेरा पुत्र अर्जुन ही आज कर्णका वध करके विजयश्रीका वरण करे’॥ ५८-५९॥ इति सूर्यस्य चैवासीद् विवादो वासवस्य च । पक्षसंस्थितयोस्तत्र तयोर्विबुधसिंहयोः । द्वैपक्ष्यमासीद् देवानामसुराणां च भारत ॥ ६० ॥ इस प्रकार सूर्य और इन्द्रमें विवाद होने लगा। वे दोनों देवश्रेष्ठ वहाँ एक-एक पक्षमें खड़े थे। भारत! देवताओं और असुरोंमें भी वहाँ दो पक्ष हो गये थे॥ समेतौ तौ महात्मानौ दृष्ट्वा कर्णधनंजयौ । अकम्पन्त त्रयो लोकाः सहदेवर्षिचारणाः ॥ ६१ ॥