महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextउस समय हाथी, अश्व, रथ और पैदल सैनिकोंसे भरा हुआ बाण, खड्ग, शक्ति और ऋष्टि आदि अस्त्र-शस्त्रोंके प्रहारसे दुःसह प्रतीत होनेवाला एवं मृतकोंके शरीरोंसे व्याप्त हुआ वह वीरसेवित समरांगण खूनसे लाल दिखायी देने लगा ॥ ४ ॥
बभूव युद्धं कुरुपाण्डवानां यथा सुराणामसुरैः सहाभवत् । तथा प्रवृत्ते तुमुले सुदारुणे धनंजयस्याधिरथेश्च सायकैः ॥ ५ ॥ दिशश्च सैन्यं च शितैरजिह्मगैः परस्परं प्रावृणुतां सुदंशितौ । जैसे पूर्वकालमें देवताओंका असुरोंके साथ संग्राम हुआ था, उसी प्रकार पाण्डवोंका कौरवोंके साथ युद्ध होने लगा। अर्जुन और कर्णके बाणोंसे वह अत्यन्त दारुण तुमुल युद्ध आरम्भ होनेपर वे दोनों कवचधारी वीर अपने पैने बाणोंसे परस्पर सम्पूर्ण दिशाओं तथा सेनाको आच्छादित करने लगे ॥ ५ १/२ ॥
ततस्त्वदीयाश्च परे च सायकैः कृतेऽन्धकारे ददृशुर्न किंचन ॥ ६ ॥ भयातुरा एकरथौ समाश्रयं- स्ततोऽभवत् त्वद्भुतमेव सर्वतः । तत्पश्चात् आपके और शत्रुपक्षके सैनिक जब बाणोंसे फैले हुए अन्धकारमें कुछ भी देख न सके, तब भयसे आतुर हो उन दोनों प्रधान रथियोंकी शरणमें आ गये। फिर तो चारों ओर अद्भुत युद्ध होने लगा ॥ ६ १/२ ॥
ततोऽस्त्रमस्त्रेण परस्परं तौ विधूय वाताविव पूर्वपश्चिमौ ॥ ७ ॥ घनान्धकारे वितते तमोनुदौ यथोदितौ तद्वदतीव रेजतुः । तदनन्तर जैसे पूर्व और पश्चिमकी हवाएँ एक-दूसरीको दबाती हैं, उसी प्रकार वे दोनों वीर एक-दूसरेके अस्त्रोंको अपने अस्त्रोंद्वारा नष्ट करके फैले हुए प्रगाढ़ अन्धकारमें उदित हुए सूर्य और चन्द्रमाके समान अत्यन्त प्रकाशित होने लगे ॥ ७ १/२ ॥
न चाभिसर्तव्यमिति प्रचोदिताः परे त्वदीयाश्च तथावतस्थिरे ॥ ८ ॥ महारथौ तौ परिवार्य सर्वतः सुरासुराः शम्बरवासवाविव । ‘किसीको युद्धसे मुँह मोड़कर भागना नहीं चाहिये' इस नियमसे प्रेरित होकर आपके और शत्रुपक्षके सैनिक उन दोनों महारथियोंको चारों ओरसे घेरकर उसी प्रकार युद्धमें डटे