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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished3,237 pages

Page 2324 of 3237

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Page 2324

वृकोदरस्तद्वशगस्तथा यमौ । त्वया तु पार्थैश्च कृते च संविदे प्रजाः शिवं प्राप्नुयुरिच्छया तव ॥ २३ ॥ व्रजन्तु शेषाः स्वपुराणि बान्धवा निवृत्तयुद्धाश्च भवन्तु सैनिकाः । न चेद् वचः श्रोष्यसि मे नराधिप ध्रुवं प्रतप्तासि हतोऽरिभिर्युधि ॥ २४ ॥ 'युधिष्ठिर तो सभी प्राणियोंके हितमें ही लगे रहते हैं। अतः वे भी मेरी बात मान लेंगे। बाकी रहे भीमसेन और नकुल-सहदेव, सो ये भी धर्मराजके अधीन हैं; (अतः उनकी इच्छाके विरुद्ध कुछ नहीं करेंगे) इस प्रकार पाण्डवोंके साथ तुम्हारी संधि हो जानेपर सारी प्रजाका कल्याण होगा। फिर तुम्हारी इच्छासे सगे-सम्बन्धी भाई-बन्धु अपने-अपने नगरको लौट जायँ और समस्त सैनिकोंको युद्धसे छुट्टी मिल जाय। नरेश्वर! यदि मेरी बात नहीं सुनोगे तो निश्चय ही युद्धमें शत्रुओंके हाथसे मारे जाओगे और उस समय तुम्हें बड़ा पश्चात्ताप होगा ॥ २३-२४ ॥ (वृद्धं पितरमालोक्य गान्धारीं च यशस्विनीम् । कृपालुर्धर्मराजो हि याचितः शममेष्यति ॥ 'बूढ़े पिता धृतराष्ट्र और यशस्विनी माता गान्धारीकी ओर देखकर दयालु धर्मराज युधिष्ठिर मेरे अनुरोध करनेपर भी संधि कर लेंगे। यथोचितं च वै राज्यमनुज्ञास्यति ते प्रभुः । विपश्चित् सुमतिर्धीरः सर्वशास्त्रार्थतत्त्ववित् ॥ 'वे सामर्थ्यशाली, विद्वान्, उत्तम बुद्धिसे युक्त, धैर्यवान् तथा सम्पूर्ण शास्त्रोंके तत्त्वको जाननेवाले हैं; अतः तुम्हारे लिये राज्यका जितना भाग उचित है, उसपर शासन करनेके लिये वे तुम्हें स्वयं ही आज्ञा दे देंगे। वैरं नेष्यति धर्मात्मा स्वजने नास्त्यतिक्रमः । न विग्रहमतिः कृष्णः स्वजने प्रतिनन्दति ॥ 'धर्मात्मा युधिष्ठिर वैर दूर कर देंगे; क्योंकि आत्मीयजनसे कोई भूल हो जाय तो उसे अक्षम्य अपराध नहीं माना जाता। श्रीकृष्ण भी यह नहीं चाहते कि आपसमें कलह हो, वे स्वजनोंपर सदा संतुष्ट रहते हैं। भीमसेनार्जुनौ चोभौ माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ । वासुदेवमते चैव पाण्डवस्य च धीमतः ॥ स्थास्यन्ति पुरुषव्याघ्रास्तयोर्वचनगौरवात् । 'भीमसेन, अर्जुन और दोनों भाई माद्रीकुमार पाण्डुपुत्र नकुल-सहदेव—ये सब लोग भगवान् श्रीकृष्ण तथा बुद्धिमान् युधिष्ठिरकी रायसे चलते हैं; अतः ये पुरुषसिंह वीर उन