Skip to content
BharatKosha
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished3,237 pages

Page 2331 of 3237

Read in context
Page 2331

विचित्रवर्माभरणाम्बरायुधे । चकम्पतुर्विस्मयनीयरूपे वियद्गताश्चार्जुनकर्णसंयुगे ॥ ८ ॥ विचित्र कवच, आभूषण, वस्त्र और आयुध धारण करनेवाली, हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंसहित उभय पक्षकी चतुरंगिणी सेनाएँ अर्जुन और कर्णके उस युद्धमें भयके कारण आश्चर्यजनकरूपसे काँपने लगीं तथा आकाशवर्ती प्राणी भी भयसे थर्रा उठे ॥ ८ ॥

भुजाः सवस्त्राङ्गुलयः समुच्छ्रिताः ससिंहनादैर्हृषितैर्दिदृक्षुभिः । यदर्जुनो मत्त इव द्विपो द्विपं समभ्ययादाधिरथिं जिघांसया ॥ ९ ॥ जैसे मतवाला हाथी किसी हाथीपर आक्रमण करता है, उसी प्रकार अर्जुन जब कर्णके वधकी इच्छासे उसपर धावा करने लगे, उस समय दर्शकोंने आनन्दित हो सिंहनाद करते हुए अपने हाथ ऊपर उठा दिये और अंगुलियोंमें वस्त्र लेकर उन्हें हिलाना आरम्भ किया ॥ ९ ॥

(ततः कुरूणामथ सोमकानां शब्दो महान् प्रादुरभूत् समन्तात् । यदार्जुनं सूतपुत्रोऽपराह्ने महाहवे शैलमिवाम्बुदोऽर्छत् ॥ तदैव चासीद् रथयोः समागमो महारणे शोणितमांसकर्दमे ॥) जब महासमरमें अपराह्नके समय पर्वतपर जानेवाले मेघके समान सूतपुत्र कर्णने अर्जुनपर आक्रमण किया, उस समय कौरवों और सोमकोंका महान् कोलाहल सब ओर प्रकट होने लगा। उसी समय उन दोनों रथोंका संघर्ष आरम्भ हुआ। उस महायुद्धमें रक्त और मांसकी कीच जम गयी थी।

उदक्रोशन् सोमकास्तत्र पार्थ पुरःसराश्चार्जुन भिन्धि कर्णम् । छिन्ध्यस्य मूर्धानमलं चिरेण श्रद्धां च राज्याद् धृतराष्ट्रसूनोः ॥ १० ॥ उस समय सोमकोंने आगे बढ़कर वहाँ कुन्तीकुमारसे पुकार-पुकारकर कहा—‘अर्जुन! तुम कर्णको मार डालो। अब देर करनेकी आवश्यकता नहीं है। कर्णके मस्तक और दुर्योधनकी राज्य-प्राप्तिकी आशा दोनोंको एक साथ ही काट डालो’ ॥ १० ॥

तथास्माकं बहवस्तत्र योधाः कर्णं तथा याहि याहीत्यवोचन् ।