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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished3,237 pages

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उस समय अर्जुनने उस असंख्य, अपार, दुर्लङ्घ्य एवं अक्षोभ्य रण-समुद्रको सीमावर्ती तटप्रान्तके समान होकर अपने बाणोंद्वारा रोक दिया। उस रणसागरमें बाणोंकी तरंगें उठ रही थीं, फहराते हुए ध्वज भौंरोंके समान जान पड़ते थे, हाथी ग्राह थे, पैदल सैनिक मत्स्य और कीचड़के समान प्रतीत होते थे, शंखों और दुन्दुभियोंकी ध्वनि ही उस रणसिन्धुकी गम्भीर गर्जना थी, रथ ऊँची-ऊँची लहरोंके समान जान पड़ते थे, योद्धाओंकी पगड़ी और टोप कछुओंके समान थे, छत्र और पताकाएँ फेनराशि-सी प्रतीत होती थीं तथा मतवाले हाथियोंकी लाशें ऊँचे-ऊँचे शिलाखण्डोंके समान उस सैन्यसागरको व्याप्त किये हुए थीं॥ ५१—५३॥

धृतराष्ट्र उवाच

अर्जुने धरणीं प्राप्ते हयहस्ते च केशवे।
एतदन्तरमासाद्य कथं पार्थो न घातितः॥ ५४॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! जब अर्जुन धरतीपर उतर आये और भगवान् श्रीकृष्णने घोड़ोंकी चिकित्सामें हाथ लगाया, तब यह अवसर पाकर मेरे सैनिकोंने कुन्तीकुमारका वध क्यों नहीं कर डाला?॥ ५४॥

संजय उवाच

सद्यः पार्थिव पार्थेन निरुद्धाः सर्वपार्थिवाः।
रथस्था धरणीस्थेन वाक्यमच्छान्दसं यथा॥ ५५॥
**संजयने कहा—**महाराज! उस समय पार्थने पृथ्वीपर खड़े होकर रथपर बैठे हुए समस्त भूपालोंको सहसा उसी प्रकार रोक दिया, जैसे वेदविरुद्ध वाक्य अग्राह्य कर दिया जाता है॥ ५५॥

स पार्थः पार्थिवान् सर्वान् भूमिस्थोऽपि रथस्थितान्।
एको निवारयामास लोभः सर्वगुणानिव॥ ५६॥
अर्जुनने अकेले ही पृथ्वीपर खड़े रहकर भी रथपर बैठे हुए समस्त पृथ्वीपतियोंको उसी प्रकार रोक दिया, जैसे लोभ सम्पूर्ण गुणोंका निवारण कर देता है॥ ५६॥

ततो जनार्दनः संख्ये प्रियं पुरुषसत्तमम्।
असम्भ्रान्तो महाबाहुरर्जुनं वाक्यमब्रवीत्॥ ५७॥
तदनन्तर सम्भ्रमरहित महाबाहु भगवान् श्रीकृष्णने युद्धस्थलमें अपने प्रिय सखा पुरुषप्रवर अर्जुनसे यह बात कही—॥ ५७॥

उदपानमिहाश्वानां नालमस्ति रणेऽर्जुन।
परीप्सन्ते जलं चेमे पेयं न त्ववगाहनम्॥ ५८॥
‘अर्जुन! यहाँ घोड़ोंके पीनेके लिये पर्याप्त जल नहीं है। ये पीनेयोग्य जल चाहते हैं। इन्हें स्नानकी इच्छा नहीं है’॥ ५८॥