महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextधनुर्विस्फारयात्यर्थमहं ध्मास्यामि चाम्बुजम् ॥ ३८ ॥ तब वृष्णिवीर श्रीकृष्णने तुरंत ही अर्जुनसे कहा—‘तुम जोर-जोरसे धनुषको खींचो और मैं अपना शंख बजाऊँगा’ ॥ ३८ ॥
ततो विस्फार्य बलवद् गाण्डीवं जघ्निवान् रिपून् । महता शरवर्षेण तलशब्देन चार्जुनः ॥ ३९ ॥ यह सुनकर अर्जुनने बड़े जोरसे गाण्डीव धनुषको खींचकर हथेलीके चटचट शब्दके साथ भारी बाण-वर्षा करते हुए शत्रुओंका संहार आरम्भ किया ॥ ३९ ॥
पाञ्चजन्यं च बलवान् दध्मौ तारेण केशवः । रजसा ध्वस्तपक्ष्मान्ताः प्रस्विन्नवदनो भृशम् ॥ ४० ॥ बलवान् केशवने उच्च स्वरसे पांचजन्य शंख बजाया। उस समय उनकी पलकें धूलधूसरित हो रही थीं और उनके मुखपर बहुत-सी पसीनेकी बूँदें छा रही थीं ॥ ४० ॥
(तेनाच्युतोष्ठयुगपूरितमारुतेन शंखान्तरोदरविवृद्धविनिःसृतेन । नादेन सासुरवियत्सुरलोकपाल- मुद्विग्नमीश्वर जगत् स्फुटतीव सर्वम् ॥) तस्य शङ्खस्य नादेन धनुषो निःस्वनेन च । निःसत्त्वाश्च ससत्त्वाश्च क्षितौ पेतुस्तदा जनाः ॥ ४१ ॥ ‘नरेश्वर! भगवान् श्रीकृष्णके दोनों ओठोंसे भरी हुई वायु शंखके भीतरी भागमें प्रवेश करके पुष्ट हो जब गम्भीर नादके रूपमें बाहर निकली, उस समय असुरलोक (पाताल), अन्तरिक्ष, देवलोक और लोकपालोंसहित सम्पूर्ण जगत् भयसे उद्विग्न हो विदीर्ण होता-सा जान पड़ा। उस शंखकी ध्वनि और धनुषकी टंकारसे उद्विग्न हो निर्बल और सबल सभी शत्रु-सैनिक उस समय पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ४१ ॥
तैर्विमुक्तो रथो रेजे वाय्वीरित इवाम्बुदः । जयद्रथस्य गोप्तारस्ततः क्षुब्धाः सहानुगाः ॥ ४२ ॥ उनके घेरेसे मुक्त हुआ अर्जुनका रथ वायुसंचालित मेघके समान शोभा पाने लगा। इससे जयद्रथके रक्षक सेवकोंसहित क्षुब्ध हो उठे ॥ ४२ ॥
ते दृष्ट्वा सहसा पार्थं गोप्तारः सैन्धवस्य तु । चक्रुर्नादान् महेष्वासाः कम्पयन्तो वसुंधराम् ॥ ४३ ॥ जयद्रथकी रक्षामें नियुक्त हुए महाधनुर्धर वीर सहसा अर्जुनको देखकर पृथ्वीको कँपाते हुए जोर-जोरसे गर्जना करने लगे ॥ ४३ ॥
बाणशब्दरवांश्चोग्रान् विमिश्रान् शङ्खनिःस्वनैः । प्रादुश्चक्रुर्महात्मानः सिंहनादरवानपि ॥ ४४ ॥