महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextद्रोणं पञ्चाशताविध्यन्नाराचैरग्निसंनिभैः ॥ ७ ॥ तब अंकुशकी मार खाये हुए गजराजके समान अत्यन्त कुपित हुए महाबाहु सात्यकिने अग्निके समान तेजस्वी पचास नाराचोंद्वारा द्रोणाचार्यको वेध दिया ॥ ७ ॥
भारद्वाजो रणे विद्धो युयुधानेन सत्वरम् । सात्यकिं बहुभिर्बाणैर्यतमानमविध्यत ॥ ८ ॥ सात्यकिके द्वारा समरांगणमें घायल हो द्रोणाचार्यने शीघ्र ही बहुत-से बाण मारकर विजयके लिये प्रयत्न करनेवाले सात्यकिको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ८ ॥
ततः क्रुद्धो महेष्वासो भूय एव महाबलः । सात्वतं पीडयामास शरेणानतपर्वणा ॥ ९ ॥ तदनन्तर महाधनुर्धर महाबली द्रोणने पुनः कुपित होकर झुकी हुई गाँठवाले एक बाणद्वारा सात्यकिको गहरी चोट पहुँचायी ॥ ९ ॥
स वध्यमानः समरे भारद्वाजेन सात्यकिः । नान्वपद्यत कर्तव्यं किञ्चिदेव विशाम्पते ॥ १० ॥ प्रजानाथ! समरभूमिमें द्रोणाचार्यके द्वारा क्षत-विक्षत होकर सात्यकिसे कुछ भी करते नहीं बना ॥ १० ॥
विषण्णवदनश्चापि युयुधानोऽभवन्नृप । भारद्वाजं रणे दृष्ट्वा विसृजन्तं शितान् शरान् ॥ ११ ॥ नरेश्वर! रणक्षेत्रमें पैने बाणोंकी वर्षा करते हुए द्रोणाचार्यको देखकर युयुधानके मुखपर विषाद छा गया ॥ ११ ॥
तं तु सम्प्रेक्ष्य ते पुत्राः सैनिकाश्च विशाम्पते । प्रहृष्टमनसो भूत्वा सिंहवद् व्यनदन् मुहुः ॥ १२ ॥ प्रजापालक नरेश! उन्हें उस अवस्थामें देखकर आपके पुत्र और सैनिक प्रसन्नचित्त होकर बारंबार सिंहनाद करने लगे ॥ १२ ॥
तं श्रुत्वा निनदं घोरं पीड्यमानं च माधवम् । युधिष्ठिरोऽब्रवीद् राजा सर्वसैन्यानि भारत ॥ १३ ॥ भारत! उनकी वह घोर गर्जना सुनकर और सात्यकिको पीड़ित देखकर राजा युधिष्ठिरने अपने समस्त सैनिकोंसे कहा— ॥ १३ ॥
एष वृष्णिवरो वीरः सात्यकिः सत्यविक्रमः । ग्रस्यते युधि वीरेण भानुमानिव राहुणा ॥ १४ ॥ अभिद्रवत गच्छध्वं सात्यकिर्यत्र युध्यते । ‘योद्धाओ! जैसे राहु सूर्यको ग्रस लेता है, उसी प्रकार यह वृष्णिवंशका श्रेष्ठ वीर सत्यपराक्रमी सात्यकि युद्धस्थलमें वीर द्रोणाचार्यके द्वारा कालके गालमें जाना चाहता है। अतः तुमलोग दौड़ो और वहीं जाओ, जहाँ सात्यकि युद्ध करता है’ ॥ १४½ ॥