महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextकौरवाश्च यथा हृष्टा विनदन्ति मुहुर्मुहुः । तब पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर मोहके वशीभूत होकर इस प्रकार चिन्ता करने लगे—'जिस प्रकार शंखराज पांचजन्यकी ध्वनि हो रही है और जिस तरह कौरव-सैनिक बारंबार हर्षनाद कर रहे हैं, उससे जान पड़ता है, निश्चय ही अर्जुनकी कुशल नहीं है' ।। ३९ १/२ ।।
एवं स चिन्तयित्वा तु व्याकुलेनान्तरात्मना ।। ४० ।। अजातशत्रुः कौन्तेयः सात्वतं प्रत्यभाषत । बाष्पगद्गदया वाचा मुह्यमानो मुहुर्मुहुः । कृतस्यानन्तरापेक्षी शैनेयं शिनिपुङ्गवम् ।। ४१ ।। ऐसा विचारकर अजातशत्रु कुन्तीकुमार युधिष्ठिरका हृदय व्याकुल हो उठा। वे चाहते थे कि जयद्रथवधका कार्य निर्विघ्न पूर्ण हो जाय; अतः बारंबार मोहित हो अश्रुगद्गद वाणीमें शिनिप्रवर सात्यकिको सम्बोधित करके बोले ।। ४०-४१ ।।
युधिष्ठिर उवाच
यः स धर्मः पुरा दृष्टः सद्भिः शैनेय शाश्वतः । साम्पराये सुहृत्कृत्ये तस्य कालोऽयमागतः ।। ४२ ।। **युधिष्ठिरने कहा—**शैनेय! साधु पुरुषोंने पूर्वकालमें विपत्तिके समय एक सुहृद्के कर्तव्यके विषयमें जिस सनातन धर्मका साक्षात्कार किया है, आज उसीके पालनका अवसर उपस्थित हुआ है ।। ४२ ।।
सर्वेष्वपि च योधेषु चिन्तयन् शिनिपुङ्गव । त्वत्तः सुहृत्तमं कञ्चिन्नाभिजानामि सात्यके ।। ४३ ।। शिनिप्रवर सात्यके! इस दृष्टिसे विचार करनेपर मैं समस्त योद्धाओंमें किसीको भी तुमसे बढ़कर अपना अतिशय सुहृत् नहीं समझ पाता हूँ ।। ४३ ।।
यो हि प्रीतमना नित्यं यश्च नित्यमनुव्रतः । स कार्ये साम्पराये तु नियोज्य इति मे मतिः ।। ४४ ।। जो सदा प्रसन्नचित्त रहता हो तथा जो नित्य-निरन्तर अपने प्रति अनुराग रखता हो, उसीको संकटकालमें किसी महत्त्वपूर्ण कार्यका सम्पादन करनेके लिये नियुक्त करना चाहिये, ऐसा मेरा मत है ।। ४४ ।।
यथा च केशवो नित्यं पाण्डवानां परायणम् । तथा त्वमपि वार्ष्णेय कृष्णतुल्यपराक्रमः ।। ४५ ।। वार्ष्णेय! जैसे भगवान् श्रीकृष्ण सदा पाण्डवोंके परम आश्रय हैं, उसी प्रकार तुम भी हो। तुम्हारा पराक्रम भी श्रीकृष्णके समान ही है ।। ४५ ।।
सोऽहं भारं समाधास्ये त्वयि तं वोढुमर्हसि ।