महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
Page 771 of 3237
Read in contextक्षेपण्यसिगदाशक्तिशरप्रासझषाकुलम् ॥ १३ ॥ ध्वजभूषणसम्बाधरत्नोपलसुसंचितम् । वाहनैरभिधावद्भिर्वायुवेगविकम्पितम् ॥ १४ ॥ द्रोणगम्भीरपातालं कृतवर्ममहाह्रदम् । जलसंधमहाग्राहं कर्णचन्द्रोदयोद्धतम् ॥ १५ ॥ संजय! मेरी सेना भयंकर समुद्रके समान जान पड़ती है। योद्धा ही इसके अक्षय जल हैं, वाहन ही इसकी तरंगमालाएँ हैं, क्षेपणीय, खड्ग, गदा, शक्ति, बाण और प्रास आदि अस्त्र-शस्त्र इसमें मछलियोंके समान भरे हुए हैं। ध्वजा और आभूषणोंके समुदाय इसके भीतर रत्नोंके समान संचित हैं। दौड़ते हुए वाहन ही वायुके वेग हैं, जिनसे यह सैन्यसमुद्र कम्पित एवं क्षुब्ध-सा जान पड़ता है। द्रोणाचार्य ही इसकी पातालतक फैली हुई गहराई है। कृतवर्मा इसमें महान् ह्रदके समान है, जलसंध विशाल ग्राह है और कर्णरूपी चन्द्रमाके उदयसे यह सदा उद्वेलित होता रहता है ॥ १३—१५ ॥ गते सैन्यार्णवं भित्त्वा तरसा पाण्डवर्षभे । संजयैकरथेनैव युयुधाने च मामकम् ॥ १६ ॥ तत्र शेषं न पश्यामि प्रविष्टे सव्यसाचिनि । सात्वते च रथोदारे मम सैन्यस्य संजय ॥ १७ ॥ संजय! ऐसे मेरे सैन्यरूपी महासागरका वेगपूर्वक भेदन करके जब पाण्डवश्रेष्ठ सव्यसाची अर्जुन तथा सात्वतवंशी उदार महारथी युयुधान एकमात्र रथकी सहायतासे इसके भीतर घुस गये, तब मैं अपनी सेनाके शेष रहनेकी आशा नहीं देखता हूँ ॥ १६-१७ ॥ तौ तत्र समतिक्रान्तौ दृष्ट्वातीव तरस्विनौ । सिन्धुराजं तु सम्प्रेक्ष्य गाण्डीवस्येषुगोचरे ॥ १८ ॥ किं नु वा कुरवः कृत्यं विदधुः कालचोदिताः । दारुणैकायने काले कथं वा प्रतिपेदिरे ॥ १९ ॥ उन दोनों अत्यन्त वेगशाली वीरोंको वहाँ सबका उल्लंघन करके घुसे हुए देख तथा सिन्धुराज जयद्रथको गाण्डीवसे छूटे हुए बाणोंकी सीमामें उपस्थित पाकर कालप्रेरित कौरवोंने वहाँ कौन-सा कार्य किया? उस दारुण संहारके समय, जहाँ मृत्युके सिवा दूसरी कोई गति नहीं थी, किस प्रकार उन्होंने कर्तव्यका निश्चय किया? ॥ १८-१९ ॥ ग्रस्तान् हि कौरवान् मन्ये मृत्युना तात संगतान् । विक्रमोऽपि रणे तेषां न तथा दृश्यते हि वै ॥ २० ॥ तात! मैं युद्धस्थलमें एकत्र हुए कौरवोंको कालका ग्रास ही मानता हूँ; क्योंकि रणक्षेत्रमें उनका पराक्रम भी पहले-जैसा नहीं दिखायी देता है ॥ २० ॥ अक्षतौ संयुगे तत्र प्रविष्टौ कृष्णपाण्डवौ ।