महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextपरंतु द्रोणाचार्य पुनः पलक मारते-मारते अपने रथपर बैठे दिखायी देते थे। उस समय आपके योद्धा विस्मयसे आँखें फाड़-फाड़कर यह दृश्य देख रहे थे॥ २२॥
तस्मिन् क्षणे तस्य यन्ता तूर्णमश्वानचोदयत्।
भीमसेनस्य कौरव्य तदद्भुतमिवाभवत्॥ २३॥
कुरुनन्दन! इसी समय भीमसेनका सारथि तुरंत ही घोड़ोंको हाँककर वहाँ ले आया। वह एक अद्भुत-सी बात थी॥ २३॥
ततः स्वरथमास्थाय भीमसेनो महाबलः।
अभ्यद्रवत वेगेन तव पुत्रस्य वाहिनीम्॥ २४॥
तत्पश्चात् महाबली भीमसेन पुनः अपने रथपर आरूढ़ हो आपके पुत्रकी सेनापर वेगपूर्वक टूट पड़े॥ २४॥
स मृद्नन् क्षत्रियानाजौ वातो वृक्षानिवोद्धतः।
आगच्छद् दारयन् सेनां सिन्धुवेगो नगानिव॥ २५॥
जैसे उठी हुई आँधी वृक्षोंको उखाड़ फेंकती है और सिंधुका वेग पर्वतोंको विदीर्ण कर देता है, उसी प्रकार युद्धस्थलमें क्षत्रियोंको रौंदते और कौरव-सेनाको विदीर्ण करते हुए भीमसेन आगे बढ़ गये॥ २५॥
भोजानीकं समासाद्य हार्दिक्येनाभिरक्षितम्।
प्रमथ्य तरसा वीरस्तदप्यतिबलोऽभ्ययात्॥ २६॥
फिर अत्यन्त बलशाली वीर भीमसेन कृतवर्माद्वारा सुरक्षित भोजवंशियोंकी सेनाके पास जा पहुँचे और उसे वेगपूर्वक मथकर आगे चले गये॥ २६॥
संत्रासयन्ननीकानि तलशब्देन पाण्डवः।
अजयत् सर्वसैन्यानि शार्दूल इव गोवृषान्॥ २७॥
जैसे सिंह गाय-बैलोंको जीत लेता है, उसी प्रकार पाण्डुनन्दन भीमने ताली बजाकर शत्रुसेनाओंको संत्रस्त करते हुए समस्त सैनिकोंपर विजय पा ली॥ २७॥
भोजानीकमतिक्रम्य दरदानां च वाहिनीम्।
तथा म्लेच्छगणानन्यान् बहून् युद्धविशारदान्॥ २८॥
सात्यकिं चैव सम्प्रेक्ष्य युध्यमानं महारथम्।
रथेन यत्तः कौन्तेयो वेगेन प्रययौ तदा॥ २९॥
उस समय कुन्तीकुमार भीमसेन भोजवंशियोंकी सेनाको लाँघकर दरदोंकी विशाल वाहिनीको पार कर गये तथा बहुत-से युद्धविशारद म्लेच्छोंको परास्त करके महारथी सात्यकिको शत्रुओंके साथ युद्ध करते देख सावधान हो रथके द्वारा वेगपूर्वक आगे बढ़े॥ २८-२९॥
भीमसेनो महाराज द्रष्टुकामो धनंजयम्।
अतीत्य समरे योधांस्तावकान् पाण्डुनन्दनः॥ ३०॥