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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished3,237 pages

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तदनन्तर कर्णने हर्षपूर्वक सैकड़ों भेरियोंके समान गम्भीर ध्वनि करनेवाले शंखको बजाकर सब ओर गूँजा दिया। इससे पाण्डवोंकी सेनामें विक्षुब्ध समुद्रके समान हलचल पैदा हो गयी ॥ २७ ॥ तदुद्धूतं बलं दृष्ट्वा नागाश्वरथपत्तिमत् । भीमः कर्णं समासाद्य च्छादयामास सायकैः ॥ २८ ॥ हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंसे युक्त उस सेनाको विक्षुब्ध हुई देख भीमसेनने कर्णके पास जाकर उसे बाणोंद्वारा आच्छादित कर दिया ॥ २८ ॥ अश्वानृक्षसवर्णांश्च हंसवर्णैर्हयोत्तमैः । व्यामिश्रयद् रणे कर्णः पाण्डवं छादयन् शरैः ॥ २९ ॥ उस रणक्षेत्रमें पाण्डुनन्दन भीमको अपने बाणोंसे आच्छादित करते हुए कर्णने रीछके समान रंगवाले अपने काले घोड़ोंको भीमसेनके हंस-सदृश श्वेतवर्णवाले उत्तम घोड़ोंके साथ मिला दिया ॥ २९ ॥ ऋक्षवर्णान् हयान् ककैरिमिश्रान् मारुतरंहसः । निरीक्ष्य तव पुत्राणां हाहाकृतमभूद् बलम् ॥ ३० ॥ रीछके समान रंगवाले और वायुके समान वेगशाली घोड़ोंको श्वेत अश्वोंके साथ मिला हुआ देख आपके पुत्रोंकी सेनामें हाहाकार मच गया ॥ ३० ॥ ते हया बह्वशोभन्त मिश्रिता वातरंहसः । सितासिता महाराज यथा व्योम्नि बलाहकाः ॥ ३१ ॥ महाराज! वायुके समान वेगवाले वे सफेद और काले घोड़े परस्पर मिलकर आकाशमें उठे हुए सफेद और काले बादलोंके समान अधिक शोभा पा रहे थे ॥ ३१ ॥ संरब्धौ क्रोधताम्राक्षौ प्रेक्ष्य कर्णवृकोदरौ । संत्रस्ताः समकम्पन्त त्वदीयानां महारथाः ॥ ३२ ॥ रोषावेशमें भरकर क्रोधसे लाल आँखें किये कर्ण और भीमसेनको देखकर आपके महारथी भयभीत हो काँपने लगे ॥ ३२ ॥ यमराष्ट्रोपमं घोरमासीदायोधनं तयोः । दुर्दर्शं भरतश्रेष्ठ प्रेतराजपुरं यथा ॥ ३३ ॥ भरतश्रेष्ठ! उन दोनोंका संग्राम यमराजके राज्यके समान अत्यन्त भयंकर था। प्रेतराजकी पुरीके समान उसकी ओर देखना अत्यन्त कठिन हो रहा था ॥ ३३ ॥ समाजमिव तच्चित्रं प्रेक्षमाणा महारथाः । नालक्षयन् जयं व्यक्तमेकस्यैव महारणे ॥ ३४ ॥ उस विचित्र-से समाजको देखते हुए महारथियोंने उस महासमरमें निश्चय ही उन दोनोंमेंसे किसी एक ही व्यक्तिकी विजय होती नहीं देखी ॥ ३४ ॥ तयोः प्रैक्षन्त सम्मर्दं संनिकृष्टं महास्त्रयोः ।