महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextपुरुषके लिये धर्म करनेका कोई विशेष समय निश्चित नहीं है; क्योंकि मृत्यु किसीकी बाट नहीं जोहती। जब मनुष्य सदा मौतके मुखमें ही है, तब नित्य-निरन्तर धर्मका आचरण करते रहना ही उसके लिये शोभाकी बात है ।। १७ ।।
यथान्धः स्वगृहे युक्तो ह्यभ्यासादेव गच्छति ।
तथा युक्तेन मनसा प्राज्ञो गच्छति तां गतिम् ।। १८ ।।
जैसे अन्धा प्रतिदिनके अभ्याससे ही सावधानीके साथ बाहरसे अपने घरमें आ जाता है, उसी प्रकार विवेकी मनुष्य योगयुक्त चित्तके द्वारा उस परम गतिको प्राप्त कर लेता है ।। १८ ।।
मरणं जन्मनि प्रोक्तं जन्म वै मरणाश्रितम् ।
अविद्वान् मोक्षधर्मेषु बद्धो भ्रमति चक्रवत् ।
बुद्धिमार्गप्रयातस्य सुखं त्विह परत्र च ।। १९ ।।
जन्ममें मृत्युकी स्थिति बतायी गयी है और मृत्युमें जन्म निहित है। जो मोक्ष-धर्मको नहीं जानता, वह अज्ञानी मनुष्य संसारमें आबद्ध होकर जन्म-मृत्युके चक्रमें घूमता रहता है; किंतु ज्ञानमार्गसे चलनेवालेको इहलोक और परलोकमें भी सुख मिलता है ।। १९ ।।
विस्तराः क्लेशसंयुक्ताः संक्षेपास्तु सुखावहाः ।
परार्थं विस्तराः सर्वे त्यागमात्महितं विदुः ।। २० ।।
कर्मोंका विस्तार क्लेशयुक्त होता है और संक्षेप सुखदायक है। सभी कर्म-विस्तार परार्थ हैं अर्थात् मन और इन्द्रियोंकी तृप्तिके लिये हैं; परंतु त्याग अपने लिये हितकर माना गया है ।। २० ।।
यथा मृणालानुगतमाशु मुञ्चति कर्दमम् ।
तथाऽऽत्मा पुरुषस्येह मनसा परिमुच्यते ।। २१ ।।
जैसे (पानीसे निकालते समय) कमलकी नालमें लगी हुई कीचड़ पानीसे तुरंत धुल जाती है, उसी प्रकार त्यागी पुरुषका आत्मा मनके द्वारा संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है ।। २१ ।।
मनः प्रणयतेऽत्मानं स एनमभियुञ्जति ।
युक्तो यदा स भवति तदा तं पश्यते परम् ।। २२ ।।
मन आत्माको योगकी ओर ले जाता है। योगी इस मनको योगयुक्त (आत्मामें लीन) करता है। इस प्रकार जब वह योगमें सिद्धि प्राप्त कर लेता है, तब वह उस परमात्माका साक्षात्कार कर लेता है ।। २२ ।।
परार्थे वर्तमानस्तु स्वं कार्यं योऽभिमन्यते ।
इन्द्रियार्थेषु संयुक्तः स्वकार्यात् परिमुच्यते ।। २३ ।।
जो परके लिये अर्थात् इन बाह्य इन्द्रियोंकी तृप्तिके लिये विषयभोगोंमें प्रवृत्त होकर इसे अपना मुख्य कार्य समझता है, वह अपने वास्तविक कर्तव्यसे च्युत हो जाता