महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextसर्वः स्वानि शुभाशुभानि नियतं कर्माणि जन्तुः स्वयं गर्भात् सम्प्रतिपद्यते तदुभयं यत् तेन पूर्वं कृतम्। मृत्युश्चापरिहारवान् समगतिः कालेन विच्छेदिना दारोश्चूर्णमिवाश्मसारविहितं कर्मान्तिकं प्रापयेत्॥ ४५॥
सभी जीव, पूर्वजन्ममें उन्होंने जो कुछ किया है, उन अपने शुभाशुभ कर्मोंके नियत फलोंको गर्भमें प्रवेश करनेके समयसे ही क्रमशः पाने और भोगने लगते हैं। जैसे वायु आरेसे चीरकर बनाये गये लकड़ीके चूरेको उड़ा देती है, उसी प्रकार कभी टाली न जा सकनेवाली मृत्यु विनाशकारी कालकी सहायतासे मनुष्यका अन्त कर देती है॥ ४५॥
स्वरूपतामात्मकृतं च विस्तरं कुलान्वयं द्रव्यसमृद्धिसंचयम्। नरो हि सर्वो लभते यथाकृतं शुभाशुभैरात्मकृतेन कर्मणा॥ ४६॥
सब मनुष्य अपने किये हुए शुभाशुभ कर्मके अनुसार ही सुन्दर या असुन्दर रूप, अपनेसे होनेवाले योग्य-अयोग्य पुत्र-पौत्र आदिका विस्तार, उत्तम या अधम कुलमें जन्म तथा द्रव्य-समृद्धिका संचय आदि पाते हैं॥ ४६॥
भीष्म उवाच
इत्युक्तो जनको राजन् याथातथ्यं मनीषिणा। श्रुत्वा धर्मविदां श्रेष्ठः परां मुदमवाप ह॥ ४७॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! ज्ञानी महात्मा पराशर मुनिके मुखसे इस यथार्थ उपदेशको सुनकर धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ राजा जनक बहुत प्रसन्न हुए॥ ४७॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पराशरगीतायामष्टनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २९८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें पराशरगीताविषयक दो सौ अट्ठानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २९८॥