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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,450 pages

Page 1981 of 2450

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Page 1981

भीष्मजीने कहा— भारत! जो धानकी खुद्दी और तिलकी खली खाता तथा घी-तेलका परित्याग कर देता है, उसी योगीको योगबलकी प्राप्ति होती है ॥ ४३ ॥
भुञ्जानो यावकं रूक्षं दीर्घकालमरिंदम ।
एकाहारो विशुद्धात्मा योगी बलमवाप्नुयात् ॥ ४४ ॥
शत्रुदमन नरेश! जो दीर्घकालतक एक समय जौका रूखा दलिया खाता है, वह योगी शुद्धचित्त होकर योगबलकी प्राप्ति कर सकता है ॥ ४४ ॥
पक्षान् मासानृतूंश्चैतान् संवत्सरानहस्तथा ।
अपः पीत्वा पयोमिश्रा योगी बलमवाप्नुयात् ॥ ४५ ॥
जो योगी दुग्धमिश्रित जलको दिनमें एक बार पीता है; फिर पंद्रह दिनोंमें एक बार पीता है। तत्पश्चात् एक महीनेमें, एक ऋतुमें और एक वर्षमें एक बार उसे ग्रहण करता है, उसको योगशक्ति प्राप्त होती है ॥ ४५ ॥
अखण्डमपि वा मांसं सततं मनुजेश्वर ।
उपोष्‍य सम्यक् शुद्धात्मा योगी बलमवाप्नुयात् ॥ ४६ ॥
नरेश्वर! जो लगातार जीवनभरके लिये मांस नहीं खाता है और विधिपूर्वक उत्तम व्रतका पालन करके अपने अन्तःकरणको शुद्ध बना लेता है, वह योगी भी योगशक्ति प्राप्त कर लेता है ॥ ४६ ॥
कामं जित्वा तथा क्रोधं शीतोष्णे वर्षमेव च ।
भयं शोकं तथा श्वासं पौरुषान् विषयांस्तथा ॥ ४७ ॥
अरतिं दुर्जयां चैव घोरां तृष्णां च पार्थिव ।
स्पर्शं निद्रां तथा तन्द्रीं दुर्जयां नृपसत्तम ॥ ४८ ॥
दीपयन्ति महात्मानः सूक्ष्ममात्मानमात्मना ।
वीतरागा महाप्राज्ञा ध्यानाध्ययनसम्पदा ॥ ४९ ॥
पृथ्वीनाथ! नृपश्रेष्ठ! काम, क्रोध, सर्दी, गर्मी, वर्षा, भय, शोक, श्वास, मनुष्योंको प्रिय लगनेवाले विषय, दुर्जय असंतोष, घोर तृष्णा, स्पर्श, निद्रा तथा दुर्जय आलस्यको जीतकर वीतराग, महान् एवं उत्तम बुद्धिसे युक्त महात्मा योगी स्वाध्याय तथा ध्यानका सम्पादन करके बुद्धिके द्वारा सूक्ष्म आत्माका साक्षात्कार कर लेते हैं ॥
दुर्गस्त्वेष मतः पन्था ब्राह्मणानां विपश्चिताम् ।
यः कश्चिद् व्रजति ह्यस्मिन् क्षेमेण भरतर्षभ ॥ ५० ॥
भरतश्रेष्ठ! विद्वान् ब्राह्मणोंने योगके इस मार्गको दुर्गम माना है। कोई बिरला ही इस मार्गको कुशलपूर्वक तै कर सकता है ॥ ५० ॥
यथा कश्चिद् वनं घोरं बहुसर्पसरीसृपम् ।
श्वभ्रवत् तोयहीनं च दुर्गमें बहुकण्टकम् ॥ ५१ ॥
अभक्तमटवीप्रायं दावदग्धमहीरुहम् ।