महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextहै ।। १०८ ।। यच्चेतिहासेषु महत्सु दृष्टं यच्चार्थशास्त्रे नृप शिष्टजुष्टे । ज्ञानं च लोके यदिहास्ति किंचित् सांख्यागतं तच्च महन्महात्मन् ।। १०९ ।। नरेश! महात्मन्! बड़े-बड़े इतिहासोंमें, सत्पुरुषों-द्वारा सेवित अर्थशास्त्रमें तथा इस संसारमें जो कुछ भी महान् ज्ञान देखा गया है, वह सब सांख्यसे ही प्राप्त हुआ है ।। १०९ ।। शमश्च दृष्टः परमं बलं च ज्ञानं च सूक्ष्मं च यथावदुक्तम् । तपांसि सूक्ष्माणि सुखानि चैव सांख्ये यथावद् विहितानि राजन् ।। ११० ।। राजन्! प्रत्यक्ष प्राप्त मन और इन्द्रियोंका संयम, उत्तम बल, सूक्ष्मज्ञान तथा परिणाममें सुख देनेवाले जो सूक्ष्म तप बतलाये गये हैं, उन सबका सांख्यशास्त्रमें यथावत् वर्णन किया गया है ।। ११० ।। विपर्यये तस्य हि पार्थ देवान् गच्छन्ति सांख्याः सततं सुखेन । तांश्चानुसंचार्य ततः कृतार्थाः पतन्ति विप्रेषु यतेषु भूयः ।। १११ ।। कुन्तीकुमार! यदि साधनमें कुछ त्रुटि रह जानेके कारण सांख्यका सम्यक् ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ हो तो भी सांख्ययोगके साधक देवलोकमें अवश्य जाते हैं और वहाँ निरन्तर सुखसे रहते हुए देवताओंका आधिपत्य पाकर कृतार्थ हो जाते हैं। तदनन्तर पुण्यक्षयके पश्चात् वे इस लोकमें आकर पुनः साधनके लिये यत्नशील ब्राह्मणोंके यहाँ जन्म ग्रहण करते हैं ।। १११ ।। हित्वा च देहं प्रविशन्ति देवं दिवौकसो द्यामिव पार्थ सांख्याः । अतोऽधिकं तेऽभिरता महार्हे सांख्ये द्विजाः पार्थिव शिष्टजुष्टे ।। ११२ ।। पार्थ! सांख्यज्ञानी शरीर-त्यागके पश्चात् परमदेव परमात्मामें उसी प्रकार प्रवेश कर जाते हैं, जैसे देवता स्वर्गमें। पृथ्वीनाथ! अतः शिष्ट पुरुषोंद्वारा सेवित परम पूजनीय सांख्यशास्त्रमें वे सभी द्विज अधिक अनुरक्त रहते हैं ।। ११२ ।। तेषां न तिर्यग्गमनं हि दृष्टं नार्वाग्गतिः पापकृताधिवासः ।