महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
Page 2003 of 2450
Read in contextसुनो ॥ १३ ॥ युगं द्वादशसाहस्रं कल्पं विद्धि चतुर्युगम् । दशकल्पशतावृत्तमहस्तद् ब्राह्ममुच्यते ॥ १४ ॥ देवताओंके बारह हजार वर्षोंका एक चतुर्युग होता है। इसीको कल्प अर्थात् महायुग समझो। ऐसे एक हजार महायुगोंका ब्रह्माजीका एक दिन बताया जाता है ॥ १४ ॥ रात्रिश्चैतावती राजन् यस्यान्ते प्रतिबुद्ध्यते । सृजत्यनन्तकर्माणं महान्तं भूतमग्रजम् ॥ १५ ॥ मूर्तिमन्तममूर्तात्मा विश्वं शम्भुः स्वयम्भुवः । अणिमा लघिमा प्राप्तिरीशानं ज्योतिरव्ययम् ॥ १६ ॥ सर्वतः पाणिपादं तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ १७ ॥ राजन्! उनकी रात्रि भी इतनी ही बड़ी होती है; जिसके अन्तमें वे जागते हैं। अनन्तकर्म ब्रह्माजी सबके अग्रज और महान् भूत हैं। यह सम्पूर्ण विश्व उन्हींका स्वरूप है। जो अणिमा, लघिमा और प्राप्ति आदि सिद्धियोंपर शासन करनेवाले हैं, वे कल्याणस्वरूप निराकार परमेश्वर ही उन मूर्तिमान् ब्रह्माकी सृष्टि करते हैं। परमात्मा ज्योतिःस्वरूप स्वयं प्रकट और अविनाशी हैं। उनके हाथ, पैर, नेत्र, मस्तक और मुख सब ओर हैं। कान भी सब ओर हैं। वे संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित हैं ॥ १५—१७ ॥ हिरण्यगर्भो भगवानेष बुद्धिरिति स्मृतः । महानिति च योगेषु विरिञ्चिरिति चाप्यजः ॥ १८ ॥ परमेश्वरसे उत्पन्न जो सबके अग्रज भगवान् हिरण्यगर्भ हैं, ये ही बुद्धि कहे गये हैं। योगशास्त्रमें ये ही महान् कहे गये हैं। इन्हींको विरिञ्चि तथा अज भी कहते हैं ॥ १८ ॥ सांख्ये च पठ्यते शास्त्रे नामभिर्बहुधात्मकः । विचित्ररूपो विश्वात्मा एकाक्षर इति स्मृतः ॥ १९ ॥ वृतं नैकात्मकं येन कृतं त्रैलोक्यमात्मना । तथैव बहुरूपत्वाद् विश्वरूप इति स्मृतः ॥ २० ॥ अनेक नाम और रूपोंसे युक्त इन हिरण्यगर्भ ब्रह्माका सांख्यशास्त्रमें भी वर्णन आता है। ये विचित्र रूपधारी, विश्वात्मा और एकाक्षर कहे गये हैं। इस अनेक रूपोंवाली त्रिलोकीकी रचना उन्होंने ही की है और स्वयं ही इसे व्याप्त कर रक्खा है। इस प्रकार बहुत-से रूप धारण करनेके कारण वे विश्वरूप माने गये हैं ॥ १९-२० ॥ एष वै विक्रियापन्नः सृजत्यात्मानमात्मना । अहङ्कारं महातेजाः प्रजापतिमहंकृतम् ॥ २१ ॥ ये महातेजस्वी भगवान् हिरण्यगर्भ विकारको प्राप्त हो स्वयं ही अहंकारकी और उसके अभिमानी प्रजापति विराट्की सृष्टि करते हैं ॥ २१ ॥