महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextमहाराज! प्रकृति स्वतन्त्रतापूर्वक खेल करनेके लिये अपनी ही इच्छासे सैकड़ों और हजारों गुणोंको उत्पन्न करती है ।। १५ ।। यथा दीपसहस्राणि दीपान्मर्त्याः प्रकुर्वते । प्रकृतिस्तथा विकुरुते पुरुषस्य गुणान् बहून् ।। १६ ।। जैसे मनुष्य एक दीपकसे हजारों दीपक जला लेते हैं, उसी प्रकार प्रकृति पुरुषके सम्बन्धसे अनेक गुण उत्पन्न कर देती है ।। १६ ।। सत्त्वमानन्द उद्रेकः प्रीतिः प्राकाश्यमेव च । सुखं शुद्धित्वमारोग्यं संतोषः श्रद्दधानता ।। १७ ।। अकार्पण्यमसंरम्भः क्षमा धृतिरहिंसता । समता सत्यमानृण्यं मार्दवं ह्रीरचापलम् ।। १८ ।। शौचमार्जवमाचारमलौल्यं हृद्यसम्भ्रमः । इष्टानिष्टवियोगानां कृतानामविकत्थना ।। १९ ।। दानेन चात्मग्रहणमस्पृहत्वं परार्थता । सर्वभूतदया चैव सत्त्वस्यैते गुणाः स्मृताः ।। २० ।। धैर्य, आनन्द, प्रीति, उत्कर्ष, प्रकाश (ज्ञानशक्ति), सुख, शुद्धि, आरोग्य, संतोष, श्रद्धा, अकार्पण्य (दीनताका अभाव), असंरम्भ (क्रोधका अभाव), क्षमा, धृति, अहिंसा, समता, सत्य, ऋणसे रहित होना, मृदुता, लज्जा, अचंचलता, शौच, सरलता, सदाचार, अलोलुपता, हृदयमें सम्भ्रमका न होना, इष्ट और अनिष्टके वियोगका बखान न करना, दानके द्वारा धैर्य धारण करना, किसी वस्तुकी इच्छा न करना, परोपकार और सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया—ये सब सत्त्वसम्बन्धी गुण बताये गये हैं ।। १७—२० ।। रजोगुणानां संघातॊ रूपमैश्वर्यविग्रहौ । अत्यागित्वमकारुण्यं सुखदुःखोपसेवनम् ।। २१ ।। परापवादेषु रतिर्विवादानां च सेवनम् । अहंकारमसत्कारश्चिन्ता वैरोपसेवनम् ।। २२ ।। परितापोऽभिहरणं हीनाशोऽनार्जवं तथा । भेदः परुषता चैव कामः क्रोधो मदस्तथा ।। २३ ।। दर्पो द्वेषोऽतिवादश्च एते प्रोक्ता रजोगुणाः । तामसानां तु संघातं प्रवक्ष्याम्युपधार्यताम् ।। २४ ।। रूप, ऐश्वर्य, विग्रह, त्यागका अभाव, करुणाका अभाव, दुःख-सुखका उपभोग, परनिन्दामें प्रीति, वाद-विवाद करना, अहंकार, माननीय पुरुषोंका सत्कार न करना, चिन्ता, वैरभाव रखना, संताप करना, दूसरोंका धन हड़प लेना, निर्लज्जता, कुटिलता, भेदबुद्धि, कठोरता, काम, क्रोध, मद, दर्प, द्वेष और बहुत बोलनेका स्वभाव—यह रजोगुणका समूह